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    भारत-पाक सैन्य टकराव में क्या करेंगे ट्रंप, अमेरिका ने चीन को देखते हुए कर दिया स्पष्ट

    अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने दक्षिण एशिया को लेकर अपनी विदेश नीति के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव या किसी भी संभावित सैन्य टकराव में वह सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने से बचेगा। वॉशिंगटन ने नई दिल्ली को एक तरह से यह ‘मैसेज’ दिया है कि वह अपनी सुरक्षा चुनौतियों के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता न रखे।


    ट्रंप प्रशासन की ‘इंटरेस्ट-बेस्ड’ (हित-आधारित) नीति

    ट्रंप सरकार की नई रणनीति को ‘अमेरिका फर्स्ट’ के चश्मे से देखा जा रहा है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

    • तटस्थता का रुख: अमेरिका का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच के विवाद द्विपक्षीय हैं। वह अब ‘मध्यस्थ’ या ‘संकट प्रबंधक’ (Crisis Manager) की भूमिका निभाने के मूड में नहीं है।
    • सीमित सैन्य सहयोग: हालांकि अमेरिका भारत को एक प्रमुख रक्षा भागीदार मानता है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी युद्ध की स्थिति में अमेरिका अपनी सेना या खुफिया संसाधनों को सीधे तौर पर साझा करने में संकोच कर सकता है।
    • चीन बनाम पाकिस्तान: अमेरिका की प्राथमिकता चीन को नियंत्रित करना है। वह पाकिस्तान को पूरी तरह चीन की गोद में नहीं धकेलना चाहता, इसलिए वह इस्लामाबाद के साथ भी कामकाजी संबंध बनाए रखना चाहता है।

    भारत के लिए क्या है चुनौती?

    रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली को यह समझना होगा कि अमेरिका के साथ उसके संबंध अब पूरी तरह से ‘लेन-देन’ (Transactional) पर आधारित होंगे।

    1. स्वतंत्र रक्षा नीति: भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) पर भरोसा करना होगा।
    2. रूस-चीन समीकरण: यूक्रेन युद्ध और रूस के साथ भारत के संबंधों को लेकर भी अमेरिका का रुख थोड़ा सख्त रह सकता है, जिसका असर भारत-पाक विवाद पर अमेरिकी समर्थन पर पड़ सकता है।
    3. आतंकवाद पर रुख: अमेरिका आतंकवाद की निंदा तो करेगा, लेकिन वह भारत की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी कार्रवाइयों में सक्रिय भागीदार बनने से परहेज करेगा।

    विशेषज्ञों की राय: ‘आत्मनिर्भरता’ ही रास्ता

    भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के इस रुख से भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए खुद को और अधिक मजबूत करना होगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और हाल के सीमा विवादों ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी ताकतें केवल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही किसी का साथ देती हैं।


    क्या है अमेरिका का प्लान?

    अमेरिका का प्लान सीधा है—वह दक्षिण एशिया में किसी नए युद्ध में नहीं उलझना चाहता। उसकी प्राथमिकता अपनी अर्थव्यवस्था और चीन के साथ व्यापारिक युद्ध पर केंद्रित है। वह चाहता है कि भारत एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ बने, लेकिन अपनी शर्तों पर।

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