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    नेहरू-गांधी ने किया था ‘इजराइल’ का विरोध, फिर भी मुश्किल वक्त में बना रहा ‘भारत का दोस्त’

    भारत और इस्राइल के बीच आज जो अटूट और रणनीतिक साझेदारी दिखाई देती है, उसका इतिहास वैचारिक मतभेदों, कूटनीतिक जटिलताओं और समय के साथ बदलती वैश्विक राजनीति की एक दिलचस्प दास्तां है। 1948 में इस्राइल के जन्म से लेकर 2026 तक, भारत की विदेश नीति ने एक लंबा सफर तय किया है।

    नेहरू युग: वैचारिक विरोध और मान्यता (1947-1950)

    भारत की आजादी के समय, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी दोनों ही धर्म के आधार पर किसी देश के निर्माण के पक्ष में नहीं थे। चूँकि भारत ने स्वयं विभाजन का दंश झेला था, इसलिए नेहरू का मानना था कि फिलिस्तीन के भीतर यहूदी राष्ट्र बनाना भविष्य के लिए संघर्ष का कारण बनेगा।

    • संयुक्त राष्ट्र में विरोध: 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन के विभाजन के विरुद्ध मतदान किया था।
    • अरब देशों का प्रभाव: उस समय भारत की विदेश नीति ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) और अरब देशों के साथ संबंधों पर टिकी थी। भारत नहीं चाहता था कि कश्मीर मुद्दे पर अरब देश उसका साथ छोड़ दें।
    • मान्यता (1950): विरोध के बावजूद, यथार्थवाद को स्वीकार करते हुए 17 सितंबर 1950 को भारत ने आधिकारिक तौर पर इस्राइल को एक देश के रूप में मान्यता दी। हालांकि, पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए गए और केवल मुंबई में एक वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी गई।

    खामोश सहयोग का दौर (1962-1980 के दशक)

    भले ही मंचों पर भारत फिलिस्तीन का समर्थक बना रहा, लेकिन पर्दे के पीछे इस्राइल ने एक सच्चे मित्र की भूमिका निभाई।

    1. 1962 (चीन युद्ध): जब भारत चीन से हार की कगार पर था, तब नेहरू ने इस्राइल से मदद मांगी। इस्राइल ने तुरंत सैन्य उपकरण भेजे।
    2. 1965 और 1971 (पाक युद्ध): इन युद्धों के दौरान भी इस्राइल ने भारत को महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी और हथियार मुहैया कराए, जबकि आधिकारिक तौर पर हमारे बीच कोई रक्षा सौदा नहीं था।

    1992: एक कूटनीतिक क्रांति

    शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के पतन के बाद वैश्विक समीकरण बदल गए। 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए इस्राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसके बाद दिल्ली में इस्राइली दूतावास खोला गया। यह वह समय था जब भारत ने अपनी विदेश नीति को विचारधारा के बजाय राष्ट्रहित की ओर मोड़ना शुरू किया।

    कारगिल युद्ध और रक्षा सहयोग (1999)

    कारगिल युद्ध के दौरान जब भारत को ऊंची चोटियों पर बैठे दुश्मनों को निशाना बनाने के लिए ‘लेजर गाइडेड बम’ और ‘यूएवी’ (ड्रोन) की सख्त जरूरत थी, तब इस्राइल ने अपने भंडार खोल दिए। इस मदद ने युद्ध का रुख भारत के पक्ष में मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।

    मोदी युग: अटूट और खुलकर दोस्ती (2014-वर्तमान)

    2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत-इस्राइल रिश्तों में ‘हिचकिचाहट’ पूरी तरह खत्म हो गई।

    • ऐतिहासिक यात्रा (2017): पीएम मोदी इस्राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। उन्होंने फिलिस्तीन जाए बिना यह यात्रा की, जिसे कूटनीति में ‘डी-हाइफनेशन’ (De-hyphenation) कहा गया।
    • रणनीतिक साझेदारी: अब दोनों देश केवल खरीदार-विक्रेता नहीं हैं, बल्कि सह-उत्पादक हैं। ‘बराक-8’ मिसाइल प्रणाली इसका बड़ा उदाहरण है।
    • कृषि और जल: इस्राइल की ‘ड्रिप इरिगेशन’ तकनीक ने भारत के शुष्क इलाकों में कृषि क्रांति ला दी है।

    मित्र से अभिन्न मित्र तक

    नेहरू की शुरुआती आपत्तियां उस समय के भू-राजनीतिक संदर्भ में थीं, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, भारत ने महसूस किया कि इस्राइल एक ऐसा साथी है जो बिना शर्त साथ खड़ा रहता है। आज भारत इस्राइल के हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है और इस्राइल भारत के लिए तकनीक और सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद स्तंभ।

    नेहरू के विरोध से शुरू हुआ यह सफर आज इस मोड़ पर है कि ‘भारत-इस्राइल दोस्ती’ को अब दुनिया के सबसे मजबूत द्विपक्षीय संबंधों में गिना जाता है।

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