राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि झगड़ा या विवाद करना भारत के स्वभाव में नहीं है और भाईचारा (Fraternity) और सामूहिक सद्भाव हमेशा से देश की परंपरा रहा है।
संघ प्रमुख के बयान के मुख्य बिंदु
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भारत की संस्कृति, राष्ट्रवाद और आपसी सद्भाव पर ज़ोर दिया।
- भाईचारे पर ज़ोर: उन्होंने कहा, “हमारा किसी से कोई विवाद नहीं है। हम विवादों से दूर रहते हैं, विवाद करना हमारे देश के स्वभाव में नहीं है। साथ रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना हमारी परंपरा है।”
- पश्चिमी राष्ट्रवाद से तुलना: भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत का राष्ट्रवाद (Rashtra) का विचार पश्चिमी राष्ट्रवाद (Nationalism) की अवधारणा से मौलिक रूप से अलग है।
- उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य हिस्सों में राष्ट्रों का विकास संघर्षों और विवादों के बीच हुआ, जिसके कारण वहाँ एक विचार के अलावा अन्य विचारों को स्वीकार नहीं किया जाता और उन्हें ‘…वाद’ कहकर पुकारा जाता है।
- इसके विपरीत, भारत का राष्ट्रत्व अहंकार या अभिमान से पैदा नहीं हुआ, बल्कि लोगों के बीच गहरे जुड़ाव और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना से उपजा है।
- ‘नेशनैलिटी’ बनाम ‘नेशनलिज्म’: संघ प्रमुख ने कहा कि वे ‘नेशनैलिटी’ शब्द का उपयोग करते हैं, न कि ‘नेशनलिज्म’ का।
- उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्र के प्रति अत्यधिक अभिमान ने दो विश्व युद्धों को जन्म दिया, इसलिए कुछ लोग ‘नेशनलिज्म’ शब्द से डरते हैं।
- उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की अवधारणा प्राचीन काल से ही ‘राष्ट्र’ की रही है।
- ज्ञान और संतोष: भागवत ने कहा कि केवल जानकारी से ज़्यादा व्यावहारिक ज्ञान और सार्थक जीवन अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि दूसरों की मदद करने से सच्चा संतोष मिलता है, जो क्षणिक उपलब्धियों से ज़्यादा टिकाऊ होता है।
मोहन भागवत ने नागपुर के एक राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव में ये बातें कही, जहाँ उन्होंने भारत की सभ्यतागत निरंतरता और सामाजिक एकता के महत्व को रेखांकित किया।


