पश्चिम बंगाल में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसा भावुक पल आया, जिसने वहां मौजूद हजारों लोगों और टीवी पर देख रहे करोड़ों दर्शकों का दिल जीत लिया। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंच पर पहुंचे, तो उन्होंने 98 वर्षीय माखनलाल सरकार को देखते ही उन्हें गले लगा लिया और झुककर उनके पैर छुए। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर ये वयोवृद्ध व्यक्ति कौन हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री ने इतना सम्मान दिया।
कौन हैं माखनलाल सरकार?
माखनलाल सरकार बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (और उससे पहले जनसंघ) के सबसे पुराने जीवित स्तंभों में से एक हैं। उनका जीवन त्याग, संघर्ष और वैचारिक दृढ़ता की एक मिसाल है।
- जनसंघ के शुरुआती सिपाही: माखनलाल उस दौर से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों से जुड़े हैं, जब बंगाल में जनसंघ का नाम लेने वाले गिने-चुने लोग थे। उन्होंने पार्टी को उस समय सींचा जब वहां जीतना तो दूर, चुनाव लड़ना भी एक बड़ी चुनौती थी।
- कश्मीर आंदोलन में भूमिका: 1950 के दशक में जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान’ के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था, तब माखनलाल सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। उन्होंने कश्मीर की पूर्ण संप्रभुता के लिए हुए संघर्षों में सक्रिय भाग लिया था।
मंच पर ‘इतिहास’ और ‘वर्तमान’ का मिलन
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उनके पैर छूने के पीछे गहरा संदेश छिपा है:
- जड़ों के प्रति सम्मान: पीएम मोदी ने अक्सर कहा है कि आज भाजपा जिस मुकाम पर है, वह पुराने कार्यकर्ताओं के खून-पसीने का नतीजा है। माखनलाल जैसे नेताओं ने दशकों तक बिना किसी पद की लालसा के संगठन के लिए काम किया।
- सभ्यतागत संस्कार: पीएम ने इस भाव के माध्यम से बंगाल की जनता को यह संदेश दिया कि उनकी राजनीति केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपने बुजुर्गों और पूर्वजों के मूल्यों के सम्मान के लिए भी है।
- पीठ थपथपाना और आशीर्वाद: 98 वर्ष की आयु में भी माखनलाल सरकार का जोश कम नहीं हुआ है। जब पीएम ने उनके पैर छुए, तो उन्होंने भावुक होकर प्रधानमंत्री के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
माखनलाल का राजनीतिक सफर
- उन्होंने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में घूम-घूमकर पार्टी की विचारधारा का प्रचार किया।
- आपातकाल (1975) के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने झुकने से इनकार कर दिया।
- वे बंगाल भाजपा के उन चंद नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने राज्य में कम्युनिस्टों और फिर टीएमसी के उदय और पतन को अपनी आंखों से देखा है।
शपथ ग्रहण के भव्य मंच पर माखनलाल सरकार की मौजूदगी इस बात का प्रमाण थी कि बंगाल में भाजपा की जीत रातों-रात नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे माखनलाल जैसे तपस्वियों की 70 साल की लंबी साधना है। प्रधानमंत्री के इस आचरण ने न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया, बल्कि बंगाल की ‘श्रद्धा और भक्ति’ की संस्कृति को भी वैश्विक मंच पर प्रदर्शित किया।
माखनलाल सरकार आज उन सभी गुमनाम कार्यकर्ताओं का चेहरा बन गए हैं, जिन्होंने पार्टी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।


