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    विश्व पर्यावरण दिवस: तापमान ने तोड़ा 124 साल का रिकॉर्ड, देश में साढ़े 4 हजार लोगों को गई जान

    विश्व पर्यावरण दिवस पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और ‘डाउन टू अर्थ’ द्वारा जारी की गई रिपोर्ट देश में गहराते पर्यावरण संकट की एक भयावह तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, अंधाधुंध कटते जंगल और घटते भूजल स्तर के कारण पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ चुका है। इसका सीधा नतीजा यह हुआ है कि भारत का मौसम चक्र पूरी तरह से बेपटरी हो गया है और तापमान ने पिछले 124 साल के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

    124 साल का टूटा रिकॉर्ड और बढ़ता तापमान

    वर्ष 2025 भारत के इतिहास का आठवां सबसे गर्म साल दर्ज किया गया। इस दौरान औसत तापमान सामान्य (1991-2020 के औसत) से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।

    • सर्दियों में रिकॉर्ड गर्मी: जनवरी और फरवरी के महीनों में तापमान में 1.17 डिग्री सेल्सियस की रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी देखी गई, जो कि साल 1901 (पिछले 124 वर्षों) के बाद से अब तक की सबसे बड़ी विसंगति है।
    • बदलता विंटर पैटर्न: फरवरी 2026 में देश के इतिहास में पहली बार एक भी शीतलहर (Cold Wave) दर्ज नहीं की गई। इसके विपरीत, पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश को मार्च 2026 की शुरुआत में ही गंभीर लू (Heatwave) का सामना करना पड़ा।

    चरम मौसमी घटनाएं और तबाही

    चरम मौसमी घटनाएं (Extreme Weather Events) अब देश में कोई अपवाद नहीं बल्कि रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी हैं। वर्ष 2025 में भारत ने 99% दिनों तक किसी न किसी रूप में चरम मौसम का सामना किया।

    • जान-माल का नुकसान: इन घटनाओं के कारण देश में 4,421 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
    • खेती पर मार: करीब 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसलों का क्षेत्र पूरी तरह तबाह हो गया। मार्च और अप्रैल के महीने अब किसानों के लिए सबसे जोखिम भरे बन गए हैं, क्योंकि इस दौरान बेमौसम भारी बारिश, ओलावृष्टि और अचानक तापमान बढ़ने की घटनाएं तेजी से फैली हैं।
    • रिकॉर्ड तोड़ बारिश: देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 21 राज्यों में 124 वर्षों में 24 घंटे के दौरान होने वाली सर्वाधिक मासिक वर्षा का रिकॉर्ड भी टूट गया।

    वायु प्रदूषण का जानलेवा ग्राफ

    रिपोर्ट के अनुसार, देश की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है और वर्तमान में हर आठ में से एक भारतीय किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है।

    • वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया भर में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत की हिस्सेदारी 23.76% से बढ़कर अब 25.34% हो गई है।
    • मृत्यु दर: साल 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु दर प्रति 100,000 लोगों पर 186 रही, जबकि इसका वैश्विक औसत महज 114 है। पिछले एक दशक में पीएम 2.5 (PM 2.5) कणों के कारण होने वाली मौतों में 61% का भारी उछाल आया है।
    • राहत की बात: उज्ज्वला जैसी योजनाओं और स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन (LPG) के इस्तेमाल से घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में 22% की कमी दर्ज की गई है।

    घटते जंगल और बढ़ता जल संकट

    • वन भूमि का दोहन: साल 2020-21 से 2024-25 के बीच पर्यावरण मंत्रालय ने लगभग 97,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी कार्यों के लिए डाइवर्ट करने की मंजूरी दी। परिणामस्वरुप 26 राज्यों में वनों का दायरा घटा है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है।
    • भूजल का अत्यधिक दोहन: देश के 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश (विशेषकर पंजाब, राजस्थान और हरियाणा) अपने भूजल का इस कदर अत्यधिक दोहन कर रहे हैं कि अब प्राकृतिक जलस्रोतों के दोबारा ठीक होने की गुंजाइश भी खत्म होती जा रही है।

    जन स्वास्थ्य और राज्यों की रैंकिंग

    विकास संकेतकों और सार्वजनिक अवसंरचना (Public Infrastructure) के मामले में देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले पांच राज्य—उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल—बेहद पिछड़ गए हैं।

    • जन स्वास्थ्य के मामले में गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, केरल और सिक्किम शीर्ष 5 सर्वश्रेष्ठ राज्यों में शामिल हैं, जबकि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे आगे है।
    • वहीं, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं।

    सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने चेतावनी दी है कि यदि इन आंकड़ों को देखने के बाद भी ठोस और बड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में देश को इसके और भी भयावह परिणाम भुगतने होंगे।

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