राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष’ कार्यक्रम के दौरान जातिवाद और हिंदू पहचान पर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ प्रमुख (सरसंघचालक) का पद किसी विशेष जाति के लिए नहीं है, बल्कि वह केवल एक ‘हिंदू’ होगा।
“सरसंघचालक केवल हिंदू होगा”
मुंबई में व्याख्यानमाला के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि संघ के भीतर पद का आधार जाति नहीं, बल्कि योग्यता और समर्पण है:
- जाति का कोई स्थान नहीं: भागवत ने स्पष्ट किया कि “संघ प्रमुख किसी जाति का नहीं होता। वह केवल हिंदू होता है।” उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य समाज को जातियों में बांटना नहीं, बल्कि एक सूत्र में पिरोना है।
- हिंदुत्व एक विशेषण है: उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘हिंदू’ कोई संज्ञा (Noun) नहीं बल्कि एक विशेषण (Adjective) है। भारत में रहने वाले सभी लोग, जिनकी संस्कृति और पूर्वज एक हैं, वे हिंदू ही हैं।
विभाजन और ‘हिंदू भाव’
मोहन भागवत ने देश के विभाजन को लेकर भी अपनी राय रखी:
- विभाजन का कारण: उन्होंने कहा कि भारत का विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि हम ‘हिंदू भाव’ (Hindu Sentiment) को भूल गए थे। जिस दिन हम अपनी सांस्कृतिक एकता को भूल जाते हैं, उस दिन समाज बिखरने लगता है।
- विविधता में एकता: उन्होंने कहा कि भोजन, भाषा और पूजा पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन हमारी राष्ट्रीयता एक है। ‘हिंदुत्व’ ही हमारी सुरक्षा की गारंटी है।
सामाजिक समरसता और भविष्य का रोडमैप
संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ (Panch Parivartan) का आह्वान किया:
- सामाजिक समरसता: मन से जाति के भेदभाव को पूरी तरह मिटाना।
- कुटुंब प्रबोधन: परिवारों में संवाद बढ़ाना ताकि युवा पीढ़ी गलत रास्तों पर न जाए।
- स्वदेशी: भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देना।
- पर्यावरण: प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
- नागरिक कर्तव्य: संविधान और नियमों का पालन करना।
“अगर पूरा हिंदू समाज एक साथ खड़ा हो जाए, तो दुनिया की कोई भी ताकत भारत के उत्थान को नहीं रोक सकती।”


