पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में हुई हालिया बढ़ोतरी का सीधा असर अब आम आदमी की थाली और जेब पर पड़ने वाला है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन के दामों में आए इस उछाल से माल ढुलाई (freight charges) में करीब 3 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
माल ढुलाई पर असर और गणित
ईंधन की कीमतें बढ़ने से परिवहन क्षेत्र पर सबसे अधिक दबाव पड़ता है। माल ढुलाई महंगी होने के पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।
- परिचालन लागत में वृद्धि: ट्रकों और भारी वाहनों के कुल खर्च में डीजल की हिस्सेदारी लगभग 40-50% होती है। डीजल के दाम ₹3 प्रति लीटर बढ़ने से ट्रांसपोर्टरों की लागत सीधे तौर पर बढ़ गई है।
- लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर दबाव: भारतीय लॉजिस्टिक्स क्षेत्र पहले से ही उच्च परिचालन लागत से जूझ रहा है। अब ढुलाई दरों में 2 से 3 फीसदी की वृद्धि तय मानी जा रही है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा।
- सप्लाई चेन की बाधाएं: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे आने वाले समय में अनिश्चितता और बढ़ सकती है।
आम आदमी की जेब पर कैसे पड़ेगा असर?
जब माल ढुलाई महंगी होती है, तो इसका असर केवल परिवहन तक सीमित नहीं रहता। यह एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ की तरह काम करता है। शहरों में आने वाली दैनिक उपभोग की वस्तुओं (सब्जी, दूध, फल) की कीमतें बढ़ सकती हैं क्योंकि किसान और बिचौलिए बढ़ी हुई परिवहन लागत की भरपाई करेंगे। बिस्कुट, साबुन और अन्य घरेलू सामान बनाने वाली कंपनियां अपनी लागत कम करने के लिए उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं या मात्रा कम कर सकती हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के लिए दी जाने वाली डिलीवरी फीस में भी बढ़ोतरी की संभावना है।
महंगाई का वर्तमान परिदृश्य
भारत में थोक मुद्रास्फीति (WPI) अप्रैल में पहले ही 8.3% के उच्च स्तर पर थी। ईंधन के इन नए दामों के कारण मई और जून के आंकड़ों में और तेजी देखी जा सकती है।
यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो सरकार को उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कटौती करनी पड़ सकती है, अन्यथा मध्यम वर्ग के लिए घरेलू बजट संभालना मुश्किल हो जाएगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने इस बढ़ोतरी को ‘महंगाई का ट्रिपल अटैक’ करार दिया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों का कहना है कि सरकार को मुनाफाखोरी छोड़कर जनता को राहत देनी चाहिए। छात्र और नौकरीपेशा लोग भी परिवहन के बढ़ते खर्चों (बस किराया और ऑटो-कैब के दाम) को लेकर चिंतित हैं।


