आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने की खबर ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस पूरी बगावत के केंद्र में रहे राघव चड्ढा और पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच आखिरी पलों में क्या बातचीत हुई, इसे लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। 24 अप्रैल 2026 को हुई इस बड़ी टूट से ठीक पहले के घटनाक्रम किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थे।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी में असंतोष की भनक अरविंद केजरीवाल को नहीं थी। केजरीवाल ने राघव चड्ढा को एक ‘वन-टू-वन’ मीटिंग के लिए बुलाया था। सूत्रों का दावा है कि इस बैठक में केजरीवाल ने राघव चड्ढा को आगामी चुनावों में बड़ी जिम्मेदारी और उनके करीबियों को टिकट देने का भरोसा दिलाया था। हालांकि, राघव चड्ढा की शिकायतें पुरानी थीं। बताया जा रहा है कि वे पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और कुछ विशिष्ट नेताओं के बढ़ते हस्तक्षेप से नाराज थे।
राज्यसभा का गणित और भाजपा की रणनीति
- दो-तिहाई बहुमत: सांसदों ने बहुत बारीकी से ‘दलबदल विरोधी कानून’ का अध्ययन किया था। उन्हें पता था कि 10 में से 7 सांसदों का एक साथ जाना उनके राज्यसभा पद को सुरक्षित रखेगा।
- बीजेपी का रुख: भाजपा ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए इन सांसदों को एक सुरक्षित राजनीतिक भविष्य और राज्यसभा में उनकी वरिष्ठता बरकरार रखने का आश्वासन दिया।
‘आप’ के लिए आगे की राह
इस टूट ने आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है। पार्टी अब इन सांसदों को ‘गद्दार’ बताकर जनता के बीच जाने की योजना बना रही है। प्रियंका कक्कड़ और आतिशी जैसे नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया है, लेकिन सात बड़े चेहरों का एक साथ जाना पार्टी की राष्ट्रीय छवि और राज्यसभा में उसकी ताकत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
इस राजनीतिक उठापटक ने यह साफ कर दिया है कि 2026 का साल दिल्ली और पंजाब की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होने वाला है। राघव चड्ढा का यह कदम केवल एक दलबदल नहीं, बल्कि ‘आप’ के आंतरिक संकट की एक बड़ी परिणति है।
व्यक्तिगत स्तर पर बढ़ा असंतोष
सूत्रों के अनुसार, इन सात सांसदों का विद्रोह कोई पूर्व-नियोजित ‘सामूहिक षड्यंत्र’ नहीं था, बल्कि यह उनके व्यक्तिगत असंतोष की परिणति थी जो एक ही समय पर फूट पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, राघव चड्ढा, हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल जैसे नेता अलग-अलग कारणों से पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे थे। किसी के लिए यह संगठनात्मक अनदेखी थी, तो किसी के लिए पार्टी की बदलती विचारधारा। चौंकाने वाली बात यह है कि अरविंद केजरीवाल द्वारा बुलाई गई आखिरी मीटिंग से पहले ये सांसद एक ‘ग्रुप’ के रूप में काम नहीं कर रहे थे। हर कोई अपने स्तर पर अलग होने की योजना बना रहा था। जब मुख्यमंत्री ने उन्हें मनाने या बातचीत के लिए बुलाया, तब तक इन सांसदों ने मानसिक रूप से पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया था।


