सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज करने के संकेत दिए, बल्कि पार्टी को फटकार लगाते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करने की नसीहत भी दी।
सीजेआई की कड़ी फटकार
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान जन सुराज के वकीलों से तीखे सवाल पूछे। सीजेआई ने कहा, “जब जनता आपको नकार देती है, तो आप राहत पाने के लिए न्यायिक मंच का सहारा लेते हैं! अगर आपको प्रक्रिया से दिक्कत थी, तो सीधे चुनाव योजना को चुनौती देनी चाहिए थी। आप तो बस चुनाव रद्द करवाना चाहते हैं।”
कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई पार्टी चुनाव हार गई है, वह न्यायिक मंच का इस्तेमाल “पॉपुलैरिटी” या अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए नहीं कर सकती।
विवाद का मुख्य मुद्दा
जन सुराज पार्टी ने अपनी याचिका में बिहार चुनाव 2025 (जिसमें एनडीए ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी) को रद्द करने की मांग की थी। याचिका में निम्नलिखित आरोप लगाए गए थे:
- भ्रष्ट आचरण: आचार संहिता लागू होने के दौरान ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत महिलाओं को 10,000 रुपये की सीधी नकद राशि ट्रांसफर की गई।
- वोटरों को प्रलोभन: पार्टी का तर्क था कि राज्य के भारी राजकोषीय घाटे के बावजूद चुनाव से ठीक पहले ऐसी घोषणाएं और भुगतान करना वोटरों को खुलेआम ‘रिश्वत’ देने जैसा है।
कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह मामला एक विशिष्ट राज्य (बिहार) से संबंधित है, इसलिए याचिकाकर्ता को पटना हाई कोर्ट जाना चाहिए। सीजेआई ने कहा कि ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ (Freebies) का मुद्दा गंभीर है और कोर्ट इसकी सामान्य तौर पर जांच करेगा, लेकिन किसी हारी हुई पार्टी के कहने पर चुनाव रद्द नहीं किए जा सकते। अंततः, कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए जन सुराज के वकील ने अपनी याचिका वापस ले ली।


