सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में वैचारिक मतभेद का एक बड़ा केंद्र बन गया था। विशेष रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बीच इस मुद्दे पर स्पष्ट असहमति देखी गई थी।
नेहरू की चिंता और पाकिस्तान का संदर्भ
1951 में जब सोमनाथ मंदिर के भव्य उद्घाटन की तैयारी चल रही थी, तब नेहरू अपनी ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) छवि को लेकर काफी सतर्क थे। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार:
- लियाकत अली खान को पत्र: 21 अप्रैल, 1951 को नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखा। नेहरू को डर था कि मंदिर का पुनर्निर्माण और उसमें सरकारी भागीदारी को पाकिस्तान एक ‘हिंदू राष्ट्र’ के उदय के रूप में प्रचारित कर सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता था।
- जाम साहब को पत्र: 22 अप्रैल, 1951 को नेहरू ने सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष और सौराष्ट्र के गवर्नर जाम साहब दिग्विजय सिंह को अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए पत्र लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस आयोजन के भव्य स्वरूप और इसमें सरकारी पदों पर बैठे व्यक्तियों की भागीदारी से “गहराई से परेशान” (deeply distressed) हैं।
राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मतभेद
नेहरू की सबसे बड़ी आपत्ति राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर थी। नेहरू का मानना था कि सरकारी अधिकारियों और संवैधानिक प्रमुखों को धार्मिक अनुष्ठानों से दूर रहना चाहिए।
- नेहरू का तर्क: नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में कहा कि “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रमुख का किसी विशेष धार्मिक समारोह से जुड़ना ठीक नहीं है।”
- राजेंद्र प्रसाद का रुख: राष्ट्रपति ने नेहरू की सलाह को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि वे एक भारतीय होने के नाते वहां जा रहे हैं और भारत की परंपरा में राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है। उन्होंने ऐतिहासिक कार्यक्रम में भाग लिया और मंदिर का उद्घाटन किया।
“मैदान से सोमनाथ के शिखर तक की यात्रा केवल ईंट-पत्थरों का निर्माण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के पुनरुद्धार का प्रतीक थी।” — डॉ. राजेंद्र प्रसाद
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
सोमनाथ मंदिर का मुद्दा आज भी भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बहस का आधार बनता है। जहाँ भाजपा (BJP) इसे नेहरू की “तुष्टीकरण की राजनीति” के रूप में देखती है, वहीं नेहरू के समर्थकों का तर्क है कि वे केवल संवैधानिक मर्यादाओं और नवजात लोकतंत्र की तटस्थ छवि की रक्षा कर रहे थे।


