कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों और परिवार का साथ हो, तो गरीबी की बेड़ियाँ भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। बिहार के एक छोटे से कस्बे से निकलकर ₹160 करोड़ की कंपनी खड़ी करने वाले अरुणाभ सिन्हा की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है। यह कहानी सिर्फ एक उद्यमी (Entrepreneur) की नहीं, बल्कि एक माँ के त्याग और एक बेटे के संघर्ष की है।
जब माँ ने बेच दिए अपने कंगन
अरुणाभ सिन्हा का सपना था कि वह देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT में पढ़ाई करें। उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर IIT बॉम्बे में दाखिला तो पा लिया, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—फीस और रहने का खर्च।
मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरुणाभ के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह अचानक इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कर सकें। ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी माँ आगे आईं। अरुणाभ बताते हैं कि उनकी माँ ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने सोने के कंगन बेच दिए ताकि उनके बेटे की पढ़ाई न रुके। माँ के उस बलिदान ने अरुणाभ के मन में एक ऐसी आग लगा दी, जिसने उन्हें कभी हार न मानने की प्रेरणा दी।
IIT से उद्यमिता तक का सफर
IIT बॉम्बे से पढ़ाई पूरी करने के बाद अरुणाभ ने कुछ समय तक कॉर्पोरेट जगत में काम किया। उन्होंने फ्रैंचाइजी बिजनेस और कंज्यूमर सर्विस सेक्टर को करीब से समझा। उन्होंने महसूस किया कि भारत में ‘लॉन्ड्री’ (कपड़े धोने की सेवा) का क्षेत्र पूरी तरह से असंगठित है। लोग आज भी धोबी या घर पर कपड़े धोने पर निर्भर हैं, जहाँ न तो स्वच्छता की गारंटी है और न ही समय की।
इसी कमी को दूर करने के लिए साल 2017 में अरुणाभ ने ‘UClean’ की शुरुआत की।
कैसे बनी ₹160 करोड़ की कंपनी?
अरुणाभ ने ‘UClean’ को भारत की पहली संगठित लॉन्ड्रिंग और ड्राई-क्लीनिंग चेन के रूप में स्थापित किया। उन्होंने ‘फ्रैंचाइजी मॉडल’ अपनाया, जिससे उनका बिजनेस तेजी से फैला।
- टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: उन्होंने मोबाइल ऐप के जरिए पिक-अप और ड्रॉप की सुविधा दी, जो शहरी कामकाजी लोगों के लिए वरदान साबित हुई।
- तेजी से विस्तार: आज ‘UClean’ के भारत के 100 से अधिक शहरों में 400 से ज्यादा स्टोर्स हैं।
- टर्नओवर: शून्य से शुरू हुई यह कंपनी आज ₹160 करोड़ से ज्यादा का कारोबार कर रही है।
सीख और संदेश
अरुणाभ सिन्हा की सफलता हमें तीन बड़ी बातें सिखाती है:
- संसाधनों की कमी बहाना नहीं है: अगर आपके पास विजन है, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं।
- समस्या में ही समाधान है: उन्होंने आम लोगों की ‘कपड़े धोने’ की रोजमर्रा की समस्या को एक बड़े बिजनेस मॉडल में बदल दिया।
- कृतज्ञता (Gratitude): अपनी सफलता के शिखर पर पहुँचने के बाद भी अरुणाभ अपनी माँ के उन कंगन और त्याग को नहीं भूले हैं, जिसने उनकी सफलता की नींव रखी थी।
अरुणाभ अब न केवल एक सफल बिजनेसमैन हैं, बल्कि हजारों लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं। उनकी यह कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलते हैं।


