प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) पर लाल किले से दिए गए भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ (Ideological/Mental Naxal) को लेकर देश की राजनीति में एक नया विवाद छिड़ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने पीएम मोदी के इस बयान पर तंज कसते हुए करारा पलटवार किया है। रविवार (16 अगस्त) को पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक बेहद संक्षिप्त लेकिन तीखी पोस्ट लिखी, “I am proud to be a dimagi naxal!” (मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है!) चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया को सरकार की नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को ‘नक्सली’ का ठप्पा दिए जाने के खिलाफ विरोध के रूप में देखा जा रहा है।
पीएम मोदी ने लाल किले से क्या कहा था?
80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार ने 2014 के बाद से हथियारबंद नक्सलवाद और माओवाद को काफी हद तक कमजोर कर दिया है, जो अपने अंतिम दिन गिन रहा है। हालांकि, उन्होंने एक नए खतरे की ओर आगाह किया:
- हथियारबंद बनाम दिमागी नक्सलवाद: पीएम ने कहा कि जंगलों में बंदूक उठाने वाले नक्सली तो खत्म हो रहे हैं, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अब भी सिस्टम और समाज में मौजूद हैं जो अशांति और हिंसा फैलाने के मौकों की तलाश में रहते हैं।
- पहचान करने की अपील: उन्होंने नागरिकों से अपील की कि ऐसे ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान कर उन्हें समाज में अलग-थलग (Isolate) किया जाना चाहिए ताकि देश के युवाओं को भटकने से रोका जा सके।
- सत्ता के गलियारों पर आरोप: पीएम मोदी ने यह भी आरोप लगाया कि अतीत में माओवादी विचारधारा वाले लोगों ने नीति-निर्माण और सरकारी समितियों में पैठ बना रखी थी, जिसने कई संस्थानों को प्रभावित किया।
कांग्रेस नेताओं के रुख की तुलना
| नेता | बयान / स्टैंड | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| पी. चिदंबरम | “I am proud to be a dimagi naxal!” | प्रधानमंत्री के जुमले पर सीधा और तीखा तंज। |
| जयराम रमेश | “पॉलिटिकल डेस्पिरेशन का संकेत” | कहा कि पहले ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया और अब ‘दिमागी नक्सल’। संसद में गृह मंत्री मान चुके हैं कि कानून में ऐसी कोई परिभाषा नहीं है। |
| विपक्षी दल (TMC/CPI) | सत्ता के दुरुपयोग का आरोप | आरोप लगाया कि सरकार अपनी आलोचना करने वाले विचारकों, बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए नए शब्द गढ़ रही है। |
‘अर्बन नक्सल’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक का विवाद
बीजेपी और केंद्र सरकार का मानना है कि जो लोग सीधे तौर पर जंगलों में हथियार नहीं उठाते लेकिन वैचारिक, कानूनी और बौद्धिक स्तर पर माओवादी सोच का समर्थन करते हैं, वे देश के विकास के लिए ज्यादा खतरनाक हैं। वहीं, विपक्षी दलों का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने वाले विद्वानों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं की आवाज दबाने के लिए ऐसे शब्दों का सहारा लिया जा रहा है। चिदंबरम के इस बयान के बाद दोनों पार्टियों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है।


