बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का युग अब अपने अवसान की ओर है। उनके राज्यसभा जाने की चर्चाओं और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि बिहार अब ‘पोस्ट-नीतीश’ (Post-Nitish) दौर की ओर बढ़ रहा है।
इस बदलाव के साथ ही राज्य की राजनीति में निम्नलिखित बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
1. द्विध्रुवीय मुकाबला (BJP vs RJD)
पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति ‘नीतीश प्लस’ (जो नीतीश के साथ, उसकी सरकार) के इर्द-गिर्द घूमती थी। उनके हटने से जेडीयू का वजूद कमजोर पड़ सकता है और मुकाबला सीधे भाजपा और राजद के बीच हो जाएगा।
2. ‘हिंदुत्व’ बनाम ‘अगड़ा-पिछड़ा’ की वापसी
- भाजपा की रणनीति: नीतीश के जाने के बाद भाजपा ‘हिंदुत्व’ और ‘विकास’ के नाम पर पिछड़ों और अति-पिछड़ों (EBC) को अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी।
- राजद की रणनीति: तेजस्वी यादव ‘सामाजिक न्याय’ और ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की 90 के दशक वाली राजनीति को नए कलेवर में पेश कर सकते हैं, ताकि पिछड़ी जातियों का ध्रुवीकरण उनके पक्ष में हो।
3. जेडीयू का भविष्य और ‘वोट बैंक’ की छीना-झपटी
नीतीश कुमार ने बड़ी मेहनत से लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) और अति-पिछड़ा (EBC) वोट बैंक तैयार किया था। उनके बिना भाजपा और राजद दोनों इस बड़े वोट बैंक पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे।
4. क्या लौटेगा 90 वाला दौर?
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार फिर से उसी पुराने दौर की ओर लौट सकता है जहाँ चुनाव मुद्दों पर नहीं बल्कि जातीय गोलबंदी पर लड़े जाते थे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार भाजपा एक मजबूत शक्ति के रूप में सामने होगी, जो 90 के दशक में नहीं थी।
नीतीश के जाने से बिहार में ‘मध्यमार्गी’ राजनीति खत्म हो सकती है और वैचारिक व जातीय टकराव और तेज होने के आसार हैं।


