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    नरवणे की अप्रकाशित किताब को लेकर नया विवाद, दिल्ली पुलिस ने पेंगुइन को जारी किया नोटिस

    भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की बहुचर्चित और अभी तक अप्रकाशित संस्मरण (Memoir) ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। दिल्ली पुलिस ने इस पुस्तक के लीक होने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दिग्गज प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस (Penguin Random House) को नोटिस जारी किया है।

    पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की यह आत्मकथा पिछले काफी समय से सुरक्षा मंजूरी (Security Clearance) की प्रक्रिया के कारण रुकी हुई थी। हालांकि, आधिकारिक रिलीज से पहले ही पुस्तक की पांडुलिपि (Manuscript) के कुछ संवेदनशील हिस्से और अध्याय सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर लीक हो गए।

    दिल्ली पुलिस की कार्रवाई:

    दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पेंगुइन इंडिया को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। पुलिस ने प्रकाशक से पूछा है कि:

    1. पुस्तक की सामग्री सार्वजनिक रूप से कैसे उपलब्ध हुई जबकि इसे अभी तक बाजार में नहीं उतारा गया है?
    2. क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल और नियमों का पालन किया गया था?
    3. पांडुलिपि तक किन-किन लोगों की पहुंच थी?

    विवाद की वजह:

    इस पुस्तक के लीक हुए हिस्सों में विशेष रूप से अग्निपथ योजना और लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत-चीन गतिरोध से संबंधित जानकारियां शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय ने पहले ही स्पष्ट किया था कि सेना के किसी भी पूर्व अधिकारी को अपनी सेवा से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों को प्रकाशित करने के लिए उचित मंजूरी लेना अनिवार्य है।

    अग्निपथ योजना पर टिप्पणी:

    लीक हुई जानकारी के अनुसार, जनरल नरवणे ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ‘अग्निपथ योजना’ को लेकर सेना और सरकार के बीच शुरुआती चर्चाओं के दौरान कुछ मतभेद थे और सेना को इसके कुछ पहलुओं पर संदेह था। इन अंशों के बाहर आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई थीं।

    आगे क्या?

    रक्षा सूत्रों के अनुसार, सरकार इस बात की जांच कर रही है कि क्या पुस्तक में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) का उल्लंघन हुआ है। यदि यह पाया जाता है कि प्रकाशक या लेखक की ओर से लापरवाही हुई है, तो कानूनी कार्रवाई और बढ़ सकती है। फिलहाल, पेंगुइन की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

    यह मामला न केवल एक पूर्व सैन्य अधिकारी की अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य प्रोटोकॉल के बीच के संतुलन पर भी सवाल खड़े करता है।

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