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    NATO, EU, एशियाई देशों ने युद्ध से बनाई दूरी, जानें ट्रंप को क्यों नहीं मिल रहा है दुनिया का साथ

    ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई और एक बड़े गठबंधन की तैयारी में हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश इस बार उनका साथ देने से कतरा रहे हैं। चाहे नाटो (NATO) देश हों, यूरोपीय संघ (EU) या प्रमुख एशियाई देश—सभी ने इस युद्ध से दूरी बना ली है। यहाँ विस्तार से समझें कि ट्रंप को दुनिया का साथ क्यों नहीं मिल रहा है:

    • नाटो से तल्खी: ट्रंप अतीत में नाटो देशों को बजट बढ़ाने की चेतावनी देते रहे हैं। अब जब ट्रंप को सैन्य मदद की जरूरत है, तो यूरोपीय देश इसे ‘अमेरिका की अपनी निजी लड़ाई’ मान रहे हैं।
    • अस्थिरता का डर: सहयोगियों को लगता है कि ट्रंप के फैसले अक्सर अप्रत्याशित होते हैं, जिससे युद्ध लंबा खिंच सकता है।

    ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी का खतरा

    एशियाई देश, विशेष रूप से भारत, चीन और जापान, अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं।

    • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ईरान के पास स्थित यह समुद्री रास्ता वैश्विक तेल व्यापार की लाइफलाइन है। अगर युद्ध छिड़ता है, तो ईरान इस रास्ते को बंद कर सकता है, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और वैश्विक मंदी आ सकती है।
    • एशियाई देशों का रुख: दक्षिण कोरिया और जापान जैसे अमेरिकी सहयोगियों ने स्पष्ट किया है कि वे अपनी अर्थव्यवस्था को खतरे में डालकर युद्ध का हिस्सा नहीं बनेंगे।

    यूरोप की अपनी मजबूरियां

    यूरोपीय देश (जैसे फ्रांस और जर्मनी) अभी भी यूक्रेन-रूस युद्ध के आर्थिक और मानवीय परिणामों से जूझ रहे हैं।

    • शरणार्थी संकट: ईरान के साथ युद्ध का मतलब होगा लाखों शरणार्थियों का यूरोप की ओर पलायन। यूरोप एक और माइग्रेशन संकट झेलने की स्थिति में नहीं है।
    • परमाणु समझौता (JCPOA): यूरोप हमेशा से ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत का पक्षधर रहा है। वे सैन्य हमले को अंतिम विकल्प नहीं मानते।

    इजरायल-हमास संघर्ष का प्रभाव

    गाजा और लेबनान में जारी हिंसा के कारण मुस्लिम देशों और वैश्विक दक्षिण (Global South) में अमेरिका की छवि प्रभावित हुई है। कई देशों को लगता है कि ईरान पर हमला केवल इजरायल के हितों को साधने के लिए किया जा रहा है, न कि वैश्विक सुरक्षा के लिए।


    ट्रंप के लिए क्या हैं चुनौतियां?

    बिना सहयोगियों के, अमेरिका के लिए ईरान जैसे भौगोलिक रूप से कठिन और सैन्य रूप से सक्षम देश के साथ अकेले लड़ना बेहद महंगा और जोखिम भरा साबित हो सकता है। गठबंधन की कमी ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति को कमजोर कर रही है।

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