राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में एक महत्वपूर्ण संबोधन के दौरान दुनिया भर में जारी संघर्षों, विशेष रूप से पश्चिम एशिया (ईरान-इजरायल) के युद्ध पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके भाषण का मुख्य स्वर “सद्भाव” और “मानवीय मूल्य” रहा।
युद्ध स्वार्थ का परिणाम
मोहन भागवत ने सीधे तौर पर कहा कि वर्तमान में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जो युद्ध हो रहे हैं, वे मानवीय मूल्यों की कमी और निजी स्वार्थों का नतीजा हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। जब राष्ट्र अपने अहंकार और स्वार्थ को मानवता से ऊपर रखते हैं, तब विनाश की स्थिति पैदा होती है। दुनिया को आज हथियारों की नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और संवाद की आवश्यकता है।
पश्चिम एशिया संकट और भारत की भूमिका
इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव (जो अब 21वें दिन में प्रवेश कर चुका है) पर टिप्पणी करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि यह संघर्ष केवल देशों के बीच नहीं, बल्कि विचारधाराओं और सत्ता के संघर्ष का प्रतीक बन गया है। उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) के सिद्धांत को माना है।
सद्भाव की आवश्यकता
नागपुर में स्वयंसेवकों और प्रबुद्ध जनों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक ने दुनिया को करीब तो ला दिया है, लेकिन दिलों के बीच की दूरियां बढ़ गई हैं। भागवत के अनुसार “दुनिया को संघर्ष की नहीं, बल्कि सद्भाव की जरूरत है। शक्ति का प्रयोग कमजोरों की रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें दबाने के लिए।”
उन्होंने भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर एक “शांतिदूत” के रूप में देख रही है। भारत का सांस्कृतिक ताना-बाना सिखाता है कि हम विविधता में एकता के साथ कैसे रह सकते हैं, और यही मॉडल आज वैश्विक शांति के लिए जरूरी है।
विकास बनाम विनाश
संघ प्रमुख ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते संघर्षों को नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल विनाश विरासत में मिलेगा। उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया कि वे अपने भीतर करुणा और सेवा की भावना जगाएं, ताकि समाज और राष्ट्र स्तर पर शांति स्थापित की जा सके।


