पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ पिछले महीने हुए अंतरिम शांति समझौते (युद्धविराम) के खत्म होने का एलान कर दिया है। ट्रंप के इस बयान के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर भीषण हवाई हमले शुरू कर दिए, जिससे पूरा क्षेत्र दहल उठा है।
यह ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजर रहे तीन व्यापारिक जहाजों पर हमले किए गए। अमेरिका ने इन हमलों के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। इसके जवाब में अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान के तटीय निगरानी तंत्र, वायु रक्षा प्रणालियों, एंटी-शिप क्रूज मिसाइल लॉन्चर्स और ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) की 60 से अधिक छोटी नावों को निशाना बनाया।
प्रमुख तटीय शहरों में भारी तबाही
ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी हमलों के कारण दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में भारी विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। इनमें बंदर अब्बास (Bandar Abbas), चाबहार (Chabahar) और सिरिक (Sirik) जैसे महत्वपूर्ण शहर और बंदरगाह शामिल हैं। हवाई हमलों की वजह से चाबहार सहित कई इलाकों में बिजली गुल हो गई है। इसके अलावा बुशहर प्रांत (जहां ईरान का परमाणु ऊर्जा संयंत्र है) और अबू मूसा द्वीप पर भी धमाकों की खबरें हैं।
डोनाल्ड ट्रंप का बयान: “यह कार्रवाई ईरान द्वारा जहाजों पर किए गए हमलों का करारा जवाब है। अगर दोबारा ऐसा हुआ, तो अंजाम इससे भी कहीं ज्यादा बुरा होगा। मेरे लिए यह समझौता अब खत्म हो चुका है, क्योंकि ईरानी भरोसा करने लायक लोग नहीं हैं।”
क्यों टूटा शांति समझौता?
17 जून 2026 को एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसके तहत 60 दिनों के लिए युद्धविराम लागू किया गया था। इसका उद्देश्य एक स्थायी शांति समझौते पर पहुंचना और अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित खोलना था। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस उम्मीद को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तीन बड़े तेल टैंकरों को निशाना बनाया गया। अमेरिका ने ईरान को तेल बेचने के लिए दी गई अस्थायी छूट (लाइसेंस) को तुरंत रद्द कर दिया है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सैन्य टकराव से वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।


