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    14 या 15 जनवरी मकर संक्रांति? खगोलीय बदलावों से 55 वर्षों तक होगा ये असर!

    मकर संक्रांति के पर्व को लेकर अक्सर लोगों के मन में तारीख को लेकर भ्रम रहता है, लेकिन ज्योतिषीय गणनाओं ने अब एक बड़ी तस्वीर साफ कर दी है। काशी (वाराणसी) के विद्वानों और पंचांगों के अनुसार, अब अगले 55 वर्षों तक मकर संक्रांति मुख्य रूप से 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। खगोलीय बदलावों के कारण सूर्य का मकर राशि में प्रवेश अब 14 जनवरी की देर रात या 15 जनवरी की सुबह हो रहा है।

    तारीख बदलने का गणित

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य हर साल मकर राशि में प्रवेश करने के लिए करीब 20 मिनट का अधिक समय लेता है।

    • 72 साल का चक्र: हर 72 साल में संक्रांति की तारीख एक दिन आगे बढ़ जाती है।
    • इतिहास: एक समय था जब यह पर्व 13 जनवरी को मनाया जाता था, फिर लंबे समय तक 14 जनवरी को मनाया गया।
    • वर्तमान स्थिति: अब हम उस चक्र में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ अगले 55 सालों तक सूर्य 14 जनवरी की रात या 15 जनवरी को मकर राशि में कदम रखेगा। चूंकि हिंदू धर्म में ‘उदया तिथि’ (सूर्योदय के समय की तिथि) का महत्व है, इसलिए दान-पुण्य और स्नान 15 जनवरी को ही श्रेष्ठ रहेगा।

    2026 में मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त

    वर्ष 2026 में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात 9:00 बजे के बाद हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप पुण्य काल 15 जनवरी को सूर्योदय से लेकर पूरे दिन दान-दक्षिणा का विशेष महत्व रहेगा। पवित्र स्नान वाराणसी के गंगा घाटों पर 15 जनवरी को ही मुख्य स्नान पर्व आयोजित होगा।


    इन चीजों से करें परहेज

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संक्रांति के दिन कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है ताकि पर्व का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:

    • तामसिक भोजन: इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए।
    • नशा: किसी भी प्रकार के नशे का सेवन इस पवित्र दिन पर वर्जित है।
    • क्रोध और कठोर वाणी: संक्रांति पर किसी को अपशब्द न कहें और न ही घर में क्लेश करें।
    • बिना स्नान भोजन: मान्यता है कि इस दिन बिना पवित्र नदी में स्नान या घर पर गंगाजल मिला कर स्नान किए बिना भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
    • वृक्ष काटना: इस दिन किसी भी जीवित वृक्ष को काटना या नुकसान पहुँचाना अशुभ माना जाता है।

    क्या करें?

    इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, ऊनी कपड़े और घी का दान करना अत्यंत फलदायी होता है। उत्तर भारत में विशेष रूप से खिचड़ी का सेवन और पतंगबाजी की परंपरा इस पर्व के उत्साह को बढ़ाती है।

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