उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से काफी पहले राज्य की सियासत में ‘सड़कों पर नमाज’ जैसे ध्रुवीकरण वाले संवेदनशील मुद्दे की अचानक वापसी हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लखनऊ में दिए गए इस हालिया बयान को राजनीतिक विशेषज्ञ कोई महज संयोग नहीं मान रहे हैं। दरअसल, हाल ही में संपन्न हुए असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिली प्रचंड जीत का असर अब उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर साफ दिखने लगा है।
भाजपा ने इन दोनों राज्यों के चुनावी नतीजों से मिले आत्मविश्वास के बाद उत्तर प्रदेश में अपनी बाजी पलटने की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
असम और बंगाल की जीत ने बदला भाजपा का नैरेटिव
हालिया विधानसभा चुनावों में हिंदुत्व और कड़े राष्ट्रवाद का एजेंडा भाजपा के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ है:
- असम में हिमंत का ‘मियां’ फैक्टर: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अवैध घुसपैठियों और मियां मुसलमानों को बाहर करने का मुद्दा बेहद आक्रामक तरीके से उठाया, जिससे बहुसंख्यक समाज एकमुश्त भाजपा के पक्ष में लामबंद हुआ।
- बंगाल में शुभेंदु का ‘सनातन कार्ड’: पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक नतीजों के बाद शुभेंदु अधिकारी ने इसे ममता बनर्जी की ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ पर ‘सनातन धर्म’ की सीधी जीत करार दिया।
इन दोनों ही राज्यों में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक रहे और उनके तीखे भाषणों का असर नतीजों पर भी साफ नजर आया।
सीएम योगी का बयान और ‘नमाज’ की सियासी टाइमिंग
सोमवार को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अचानक सड़कों पर नमाज रोके जाने का मुद्दा दोबारा जीवित किया।
सीएम योगी का बयान: “हमसे लोग अक्सर बाहर पूछते हैं कि क्या आपके राज्य में सड़कों पर नमाज नहीं होती है? हम गर्व से कहते हैं कि हां, उत्तर प्रदेश में सड़कों पर नमाज नहीं होती है, आप चाहें तो खुद चलकर देख लें। हमारे यहां कानून का राज है।”
2027 के लिए भाजपा का चक्रव्यूह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के भीतर (सपा-कांग्रेस गठबंधन के हाथों) लगे झटके के बाद भाजपा अब बैकफुट से निकलकर फ्रंटफुट पर खेलने की तैयारी में है। पार्टी के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि 2024 के बाद से भाजपा ने अपने मूल कोर-एजेंडे यानी ‘प्रखर हिंदुत्व’ और ‘तुष्टीकरण विरोधी नैरेटिव’ पर वापस लौटने का फैसला किया है।
झारखंड को छोड़कर पार्टी को हर जगह इस आक्रामक लाइन का बड़ा सियासी फायदा मिला है। चूंकि उत्तर प्रदेश भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ है, इसलिए असम और बंगाल फतह के बाद अब यूपी में भी इसी कोर-एजेंडे को धार दी जा रही है ताकि विपक्षी ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के जातिगत समीकरणों को हिंदुत्व के बड़े छाते के नीचे ध्वस्त किया जा सके।


