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    ईरान के दो भीषण प्रहार और बैकफुट पर ट्रंप, बदले तेवर, शांति की अपील की

    पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच एक चौंकाने वाला मोड़ आया है। ईरान द्वारा किए गए दो बड़े हमलों ने अमेरिका की सैन्य रणनीति को हिलाकर रख दिया है। कभी ‘ईरान को नक्शे से मिटाने’ की बात करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेवर अब नरम पड़ते दिख रहे हैं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से युद्ध खत्म करने की इच्छा जताई है।आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को अपने कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं?


    ईरान के वो ‘दो वार’ जिन्होंने खेल बदल दिया

    विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने दो ऐसी जगहों पर प्रहार किया जहाँ अमेरिका को अपनी सुरक्षा पर अटूट विश्वास था:

    1. डिएगो गार्सिया पर हमला: हिंद महासागर में स्थित अमेरिका का सबसे सुरक्षित सैन्य बेस ‘डिएगो गार्सिया’ अब तक पहुंच से बाहर माना जाता था। ईरान द्वारा यहाँ बैलिस्टिक मिसाइल दागने की कोशिश ने साबित कर दिया कि उसकी मिसाइल रेंज 4,000 किमी से अधिक है। इससे पूरे क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।
    2. होर्मुज की खाड़ी में नाकेबंदी: ईरान ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन ‘होर्मुज की खाड़ी’ पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। 22 भारतीय जहाजों सहित दर्जनों अंतरराष्ट्रीय जहाजों के फंसने से वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मच गया है।

    ट्रंप के नरम पड़ने के मुख्य कारण

    • आर्थिक दबाव: युद्ध की आहट से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। अमेरिका में महंगाई बढ़ने का डर और शेयर बाजार में गिरावट ने ट्रंप प्रशासन को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
    • सैन्य जोखिम: डिएगो गार्सिया पर हुए हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो अमेरिका के कई वैश्विक ठिकाने सुरक्षित नहीं रहेंगे।
    • घरेलू राजनीति: अमेरिका में चुनाव के मद्देनजर ट्रंप एक और लंबा और खर्चीला युद्ध मोल नहीं लेना चाहते।

    अब शांति की बात

    व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने अब ‘बैकचैनल’ कूटनीति का सहारा लेना शुरू कर दिया है। उन्होंने अपने हालिया बयान में कहा, “हम विनाश नहीं, समाधान चाहते हैं। ईरान को समझना होगा कि शांति में ही सबकी भलाई है।”

    ईरान ने अपनी छिपी हुई मिसाइल क्षमता दिखाकर अमेरिका को यह संदेश दे दिया है कि वह किसी भी हद तक जा सकता है। फिलहाल, गेंद अमेरिका के पाले में है और दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बातचीत के जरिए इस महायुद्ध को टाला जा सकेगा।

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