भारत की मेजबानी में होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन इस बार सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रहने वाला। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली बैठक के बीच दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच बदलते समीकरणों ने भारत की कूटनीतिक चुनौती बढ़ा दी है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित नजदीकी पर दुनिया की नजर है, तो दूसरी ओर BRICS के भीतर रूस, चीन और ईरान जैसे देशों की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। ऐसे में भारत को संगठन के भीतर संतुलन साधते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी होगी।
ट्रंप-जिनपिंग समीकरण क्यों अहम?
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक और रणनीतिक मुद्दों पर लंबे समय से तनाव रहा है। लेकिन अब दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकात और बातचीत ने वैश्विक समीकरणों को नया आयाम दिया है। सितंबर के अंत में ट्रंप और जिनपिंग की संभावित बैठक की चर्चा भी है। ऐसे में अगर दोनों देशों के बीच किसी तरह का रणनीतिक समझौता या अस्थायी तालमेल बनता है तो इसका असर BRICS समेत पूरी वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है।
हालांकि, इसे स्थायी गठजोड़ मानना अभी जल्दबाजी होगी। अमेरिका-चीन के बीच तकनीक, दुर्लभ खनिज, टैरिफ और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद कायम हैं। इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि वह किसी भी नए अमेरिकी-चीनी समीकरण को अपने हितों के खिलाफ जाने से रोके।
BRICS में चीन का बढ़ता प्रभाव
BRICS के विस्तार के बाद संगठन का आर्थिक और राजनीतिक वजन बढ़ा है। चीन और रूस इसे पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में ज्यादा प्रभावी बनाना चाहते हैं। वहीं भारत BRICS को किसी एक देश के नेतृत्व वाले पश्चिम-विरोधी मंच में बदलने के बजाय ग्लोबल साउथ के हितों के लिए बहुपक्षीय मंच बनाए रखने पर जोर देता है।
यही मतभेद इस बार साझा घोषणापत्र को लेकर भी सामने आ रहे हैं। पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण BRICS देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं। ईरान और यूएई जैसे सदस्य देशों के बीच भी क्षेत्रीय मुद्दों पर मतभेद हैं। ऐसे में एक संयुक्त बयान पर सहमति बनाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक परीक्षा बन गया है।
डी-डॉलराइजेशन पर भारत का अलग रुख
BRICS में डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा लगातार होती रही है। चीन और कुछ अन्य सदस्य देश वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। साझा BRICS मुद्रा की बात भी समय-समय पर उठती रही है, लेकिन इसके तत्काल लागू होने की संभावना सीमित मानी जाती है।
भारत का रुख अपेक्षाकृत सावधान है। नई दिल्ली डॉलर के खिलाफ किसी आक्रामक अभियान के बजाय स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार और व्यावहारिक भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने की पक्षधर है। रूस ने भी हाल में कहा है कि वह किसी खास मुद्रा से अलग होने के बजाय स्वीकार्य भुगतान माध्यमों के लिए खुला है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी अहम
BRICS के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय मुलाकात भी प्रस्तावित है। यह मुलाकात भारत-चीन संबंधों में हालिया नरमी को आगे बढ़ाने का मौका हो सकती है। LAC, व्यापार और आर्थिक संबंधों पर दोनों नेताओं के बीच बातचीत की उम्मीद है।
ऐसे में इस बार BRICS भारत के लिए सिर्फ एक शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी जगह मजबूत करने का अवसर है। नई दिल्ली को चीन-रूस की प्राथमिकताओं, अमेरिका के साथ अपने संबंधों और पश्चिम एशिया के संकट के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे BRICS की एकता भी कायम रहे और भारत के राष्ट्रीय हित भी सुरक्षित रहें।


