गुजरात के भावनगर में लिव-इन पार्टनर की हत्या के आरोपी की पुलिस द्वारा सरेआम पिटाई का वीडियो सामने आने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। घटना उस समय की है, जब पुलिस हत्या के मामले में घटनास्थल का पुनर्निर्माण करा रही थी। वीडियो में आरोपी फैजल लखानी को रस्सियों से बांधकर घसीटते और पुलिसकर्मियों को डंडों से पीटते देखा जा सकता है। पुलिस ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए इसे अपराधियों को कड़ा संदेश देने के लिए जरूरी बताया है।
घटनास्थल पर आरोपी की पिटाई
पुलिस के मुताबिक, फैजल लखानी पर अपनी लिव-इन पार्टनर काजल बरैया की हत्या का आरोप है। शनिवार को सामने आए वीडियो में फैजल को रस्सियों से बांधकर घटनास्थल के आसपास ले जाया जा रहा है। इस दौरान पुलिसकर्मी उसे डंडों से पीटते नजर आ रहे हैं। यह कार्रवाई अपराध की जांच के तहत क्राइम सीन रीक्रिएशन के दौरान की गई।
नीलमबाग थाने के पुलिस निरीक्षक डीपी उनाडकट ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह बेहद गंभीर और क्रूर अपराध था। उनके अनुसार, घटना के बाद लोगों में यह धारणा बनने लगी थी कि अपराधी महिलाओं पर हमले कर रहे हैं और पुलिस उन्हें रोकने में असहाय है। ऐसे मामलों में अपराधियों के बीच डर पैदा करने और कड़ा संदेश देने के लिए पुलिस को सख्त रुख अपनाना पड़ा।
क्या है काजल बरैया हत्याकांड?
पुलिस के अनुसार, काजल बरैया और फैजल करीब सात साल से भावनगर में फुटपाथ पर साथ रह रहे थे। फैजल के खिलाफ पहले से लूट और अन्य गंभीर अपराधों के मामले दर्ज होने की बात भी पुलिस ने कही है।
बताया गया कि जेल से बाहर आने के बाद फैजल को पता चला कि काजल उसके परिचित रवि के साथ रिश्ते में थी। इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ। आरोप है कि फैजल ने काजल और रवि पर हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल काजल को भावनगर के सरकारी सर टी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इसके बाद फैजल को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस की कार्रवाई पर क्यों उठ रहे सवाल?
पुलिस की दलील के बावजूद सार्वजनिक रूप से आरोपी की पिटाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वजह यह है कि गुजरात में पुलिस द्वारा आरोपियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित या पीटने के खिलाफ पहले ही निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
गुजरात हाईकोर्ट में चल रही एक स्वत: संज्ञान वाली जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य के गृह विभाग के सर्कुलर का भी उल्लेख हुआ था। इसमें आरोपियों को सार्वजनिक स्थान पर उठक-बैठक करवाने, घुटनों के बल चलाने, लात मारने या डंडों से पीटने जैसी कार्रवाइयों पर रोक की बात कही गई थी। ऐसे मामलों में संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही का प्रावधान बताया गया है।
‘कड़ा संदेश’ बनाम कानून की प्रक्रिया
इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि जघन्य अपराधों के आरोपियों के खिलाफ पुलिस कितनी सख्ती कर सकती है। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, आरोपी को अदालत से दोषी ठहराए जाने तक कानूनन अपराधी नहीं माना जाता। सार्वजनिक पिटाई को सजा के तौर पर इस्तेमाल करने का अधिकार पुलिस को नहीं है।
यही वजह है कि भावनगर की घटना में एक तरफ पुलिस इसे अपराधियों में भय पैदा करने वाली कार्रवाई बता रही है, तो दूसरी तरफ मानवाधिकार और कानून के शासन से जुड़े सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की जानकारी है और पुलिस की कार्रवाई पर बहस जारी है।


