संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में तत्काल और व्यापक सुधारों की वकालत करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वथानेनी हरीश (Harish Parvathaneni) ने वैश्विक मंच पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि 1945 के दौर में बनी संस्थागत प्रणाली आज के 21वीं सदी के भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से पूरी तरह मेल नहीं खाती।
उन्होंने चेतावनी दी कि सुरक्षा परिषद सुधार प्रक्रिया को कुछ चुनिंदा देशों के निहित और बंटे हुए हितों द्वारा ‘बंधक’ नहीं बनाया जा सकता।
भारत के कड़े संदेश की मुख्य बातें
- चुनिंदा देशों का एकाधिकार नहीं: भारत ने कहा कि वैश्विक शांति और सुरक्षा का निर्णय लेने का अधिकार केवल कुछ देशों (P5) तक सीमित नहीं रह सकता। मौजूदा ढांचा दुनिया की बहुध्रुवीय (Multipolar) सच्चाई को नजरअंदाज करता है।
- किसे ठहराया जिम्मेदार?: भारत ने सुधार प्रक्रिया को रोकने के लिए ‘यथास्थितिवादी’ (Status-quoist) देशों और मौजूदा वीटो पावर रखने वाले स्थायी सदस्यों के कुछ निहित स्वार्थों को जिम्मेदार ठहराया। भारत के अनुसार, “जब तक सब कुछ तय न हो जाए, तब तक कुछ भी तय नहीं माना जाएगा” जैसी दलीलों का इस्तेमाल केवल सुधारों को टालने और असमानता को बरकरार रखने के लिए किया जा रहा है।
- आउटडेटेड आर्किटेक्चर: पी. हरीश ने सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे की तुलना 1945 के कंप्यूटर पर आधुनिक एआई (AI) तकनीक चलाने जैसा बताया, जो आज के समय की जटिल वैश्विक चुनौतियों (जैसे पश्चिम एशिया तनाव, युद्ध और संकट) को हल करने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रहा है।
स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग
भारत ने साफ किया कि केवल गैर-स्थायी (अस्थायी) श्रेणी में सीटों का विस्तार करना एक नाकामी साबित होगा, क्योंकि इससे P5 देशों के एकाधिकार वाले निर्णय लेने के ढांचे में कोई बदलाव नहीं आएगा।
भारत ने निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर बल दिया:
- ग्लोबल साउथ और अफ्रीका को प्रतिनिधित्व: एशिया, लैटिन अमेरिका और विशेष रूप से अफ्रीकी महाद्वीप को सुरक्षा परिषद में स्थायी और न्यायसंगत जगह मिलनी चाहिए।
- टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशन (Text-based Negotiations): बातचीत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए निश्चित समय-सीमा के साथ एक ड्राफ्ट टेक्स्ट पर चर्चा होनी चाहिए।
वैश्विक शांति और साख पर सवाल
पश्चिम एशिया संकट और यूक्रेन युद्ध जैसी वैश्विक त्रासदियों के बीच सुरक्षा परिषद की विफलता ने संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि यदि संयुक्त राष्ट्र को प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे समय के साथ बदलना होगा।


