वैश्विक कच्चे तेल के बाजारों में जारी अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत में पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस संकट ने देश को पारंपरिक जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। वर्तमान में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहे हैं, लेकिन इस रेस में अब ‘हाइड्रोजन फ्यूल’ (Hydrogen Fuel) भी एक गेम-चेंजर के रूप में सामने आ रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी लगातार हाइड्रोजन को भारत की ‘भविष्य की ऊर्जा’ बता रहे हैं। ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प है कि ईवी के सामने हाइड्रोजन कितना बड़ा और व्यावहारिक विकल्प है।
क्या है हाइड्रोजन फ्यूल और यह कैसे काम करता है?
वाहनों में हाइड्रोजन का उपयोग मुख्य रूप से ‘फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल’ (FCEV) तकनीक के तहत किया जाता है। इस तकनीक में कार के भीतर लगे फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच एक रासायनिक प्रक्रिया होती है, जिससे बिजली पैदा होती है और गाड़ी चलती है।
इस ईंधन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे पारंपरिक इंजनों की तरह कोई जहरीला धुआं या कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। इसके साइलेंसर से केवल पानी की बूंदें या भाप (Water Vapor) बाहर निकलती है, जो इसे 100% पर्यावरण अनुकूल बनाती है।
EV बनाम हाइड्रोजन: कौन किस पर भारी?
अक्सर हाइड्रोजन को ईवी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, ये दोनों तकनीकें अलग-अलग सेगमेंट के लिए उपयोगी हैं:
- रेंज और रीफ्यूलिंग टाइम: जहां एक इलेक्ट्रिक कार को फुल चार्ज होने में कम से कम 30 मिनट से लेकर कुछ घंटे तक का समय लगता है, वहीं हाइड्रोजन कार में महज 3 से 5 मिनट में ईंधन भरा जा सकता है। इसके अलावा, हाइड्रोजन गाड़ियाँ एक बार फुल टैंक होने पर ईवी की तुलना में कहीं अधिक लंबी दूरी (माइलेज) तय कर सकती हैं।
- लॉजिस्टिक्स और भारी वाहन: ईवी की भारी-भरकम बैटरियां बड़े कमर्शियल ट्रकों या लंबी दूरी की बसों के लिए उतनी व्यावहारिक नहीं हैं। ऐसे में हाइड्रोजन फ्यूल लंबी दूरी के भारी ट्रकों, अंतरराज्यीय बसों और जहाजों के लिए सबसे सटीक विकल्प माना जा रहा है। दूसरी ओर, व्यक्तिगत उपयोग वाली छोटी कारों और शहरी यात्राओं के लिए ईवी अधिक किफायती हैं।
हाइड्रोजन के सामने बड़ी चुनौतियाँ
तमाम खूबियों के बावजूद हाइड्रोजन को मुख्यधारा में आने में समय लगेगा, जिसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- उच्च उत्पादन लागत: वर्तमान में जीवाश्म ईंधन से बनने वाली ग्रे या ब्लू हाइड्रोजन का चलन है, जो पूरी तरह स्वच्छ नहीं है। नवीकरणीय ऊर्जा से बनने वाली ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ सबसे शुद्ध है, लेकिन फिलहाल इसका उत्पादन बेहद महंगा है।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्टोरेज की कमी: हाइड्रोजन बेहद हल्की गैस है, जिसे स्टोर और ट्रांसपोर्ट करने के लिए अत्यधिक दबाव या बेहद कम तापमान की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, भारत में अभी हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशनों का नेटवर्क न के बराबर है।
भारत का ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ प्लान
भारत सरकार ने देश को ऊर्जा आयातक (Importer) से निर्यातक (Exporter) बनाने के लिए ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ शुरू किया है, जिसके तहत 2030 तक सालाना 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य है। टुटिकोरिन, पारादीप और कांडला जैसे बंदरगाहों पर हाइड्रोजन हब विकसित किए जा रहे हैं।
हाइड्रोजन रातोंरात पेट्रोल-डीजल या ईवी की जगह नहीं लेगा। भविष्य की गतिशीलता (Mobility) किसी एक ईंधन पर टिकी नहीं होगी, बल्कि आने वाले समय में ईवी, ग्रीन हाइड्रोजन, और इथेनॉल जैसे बायोफ्यूल्स एक साथ मिलकर देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेंगे।


