मेरठ में आयोजित खिलाड़ी संवाद गोष्ठी में सरसंघचालक मोहन भागवत ने सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उत्तर प्रदेश के इस दौरे पर भागवत ने जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए ‘बंधुत्व’ (Brotherhood) को एकमात्र समाधान बताया। हालांकि, हाल के दिनों में चर्चा का विषय बने यूजीसी (UGC) विवाद और केंद्र की नई शिक्षा नीतियों से जुड़े सवालों पर उन्होंने पूरी तरह मौन साधे रखा।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि समाज में ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कुरीतियां तब तक खत्म नहीं होंगी, जब तक कि हमारे मन में एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता का भाव नहीं जागेगा। उन्होंने जोर देकर कहा, जब तक समाज खंडित रहेगा, देश शक्तिशाली नहीं बन सकता। विविधता में एकता भारत की आत्मा है, और इसे संजोना हर नागरिक का कर्तव्य है।
संघ से जुड़ने के ‘पांच मंत्र’
युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों को प्रेरित करने के लिए भागवत ने संघ की कार्यपद्धति के आधार पर पांच मुख्य सूत्र साझा किए, जिन्हें उन्होंने जीवन में उतारने की सलाह दी:
- स्वदेशी का भाव: केवल वस्तुओं में ही नहीं, बल्कि विचारों और जीवनशैली में भी भारतीयता को प्राथमिकता दें।
- कुटुंब प्रबोधन: परिवारों में संवाद बढ़ाएं ताकि संस्कार जीवित रहें और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।
- सामाजिक समरसता: अपने आचरण से जातिवाद को खत्म करें। मंदिर, श्मशान और जल के स्रोत सभी के लिए समान होने चाहिए।
- पर्यावरण संरक्षण: जल बचाएं, पेड़ लगाएं और प्लास्टिक का त्याग करें। यह ‘सृष्टि संरक्षण’ का धर्म है।
- नागरिक अनुशासन: कानून का पालन करना और नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग रहना ही सच्ची देशभक्ति है।
यूजीसी मुद्दे पर चुप्पी के मायने
पिछले कुछ समय से यूजीसी के नियमों और स्वायत्तता को लेकर चल रहे विवादों पर कयास लगाए जा रहे थे कि भागवत इस पर कुछ कह सकते हैं। लेकिन उन्होंने रणनीतिक रूप से इस राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दे से दूरी बनाए रखी। जानकारों का मानना है कि संघ सीधे सरकारी नीतियों पर टिप्पणी करने के बजाय सामाजिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित रखना चाहता है।


