आज संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर चर्चा के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के बीच जोरदार वैचारिक भिड़ंत देखने को मिली। बहस का केंद्र बिंदु ‘धर्म आधारित आरक्षण’ और ‘संविधान की व्याख्या’ रहा।
अमित शाह का रुख: ‘धर्म आधारित आरक्षण असंवैधानिक’
अमित शाह ने महिला आरक्षण बिल के प्रावधानों का बचाव करते हुए विपक्ष, विशेषकर सपा और कांग्रेस द्वारा उठाई गई ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग पर तीखा प्रहार किया। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु रहे:
- संवैधानिक मर्यादा: शाह ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है। उन्होंने कहा, “धर्म के आधार पर मुस्लिमों को आरक्षण देना पूरी तरह से असंवैधानिक है। बाबा साहब अंबेडकर के संविधान में इसके लिए कोई जगह नहीं है।”
- तुष्टिकरण का आरोप: गृह मंत्री ने विपक्षी दलों पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष जानबूझकर पिछड़े वर्गों (OBC) और अल्पसंख्यकों के मुद्दों को आपस में उलझाकर महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक कदम को रोकना चाहता है।
- कानूनी स्पष्टता: उन्होंने स्पष्ट किया कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और इसे टाला नहीं जा सकता।
अखिलेश यादव का पलटवार: ‘PDA और सामाजिक न्याय’
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अमित शाह के बयानों का विरोध करते हुए सामाजिक न्याय और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की बात दोहराई। उनके तर्क थे:
- पिछड़ों का हक: यादव ने मांग की कि महिला आरक्षण में ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए, अन्यथा यह बिल अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा।
- संविधान की रक्षा: उन्होंने कहा कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना ही सच्चा संवैधानिक धर्म है। उन्होंने भाजपा पर पिछड़े वर्गों के अधिकारों को दबाने का आरोप लगाया।
- संगी-साथियों का धोखा: यादव ने सदन में भी वही तेवर दिखाए जो उन्होंने सोशल मीडिया पर जाहिर किए थे, जिसमें उन्होंने इस बिल को ‘खुफिया लोगों की गुप्त योजना’ करार दिया था।
सदन में बढ़ा तनाव
दोनों नेताओं के बीच बहस इतनी तीखी हो गई कि सदन की कार्यवाही में कई बार बाधा आई। जब अमित शाह ने कर्नाटक और तेलंगाना में दिए गए मुस्लिम आरक्षण के फैसलों का जिक्र करते हुए उन्हें असंवैधानिक बताया, तो विपक्षी सांसदों ने जमकर नारेबाजी की।
संसद की यह बहस यह साफ करती है कि महिला आरक्षण बिल सिर्फ महिलाओं की भागीदारी का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह आगामी चुनाव से पहले ‘सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक व्याख्या’ की एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई में बदल गया है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक रणनीतिक चक्रव्यूह मान रहा है।


