उत्तराखंड की बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) ने देवभूमि के प्रमुख मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक निर्णय लिया है। 26 जनवरी 2026 को सामने आई खबरों के अनुसार, अब बदरीनाथ और केदारनाथ सहित समिति के अधीन आने वाले सभी 45 मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी है।
इस महत्वपूर्ण फैसले के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. मंदिर समिति का कड़ा रुख
श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने घोषणा की है कि देवभूमि की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा करना सर्वोपरि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
- आगामी बोर्ड बैठक में इस प्रतिबंध को लेकर एक औपचारिक प्रस्ताव (Resolution) पास किया जाएगा।
- यह नियम न केवल चारधाम के मुख्य मंदिरों पर, बल्कि BKTC के नियंत्रण वाले सभी छोटे-बड़े मंदिरों पर लागू होगा।
2. निर्णय के पीछे का कारण
समिति और स्थानीय संगठनों का तर्क है कि:
- पवित्रता का संरक्षण: गैर-हिंदू तत्वों द्वारा मंदिरों की गरिमा को ठेस पहुँचाने की शिकायतों (जैसे प्रतिबंधित वस्तुओं का सेवन) के बाद यह कदम उठाया गया है।
- प्राचीन परंपरा: अध्यक्ष का दावा है कि ऐतिहासिक रूप से इन मंदिरों में केवल हिंदुओं का प्रवेश ही मान्य था, लेकिन पिछली सरकारों के दौरान इन नियमों की अनदेखी की गई।
- गंगोत्री धाम का उदाहरण: हाल ही में श्री गंगोत्री मंदिर समिति ने भी गंगोत्री धाम और मां गंगा के शीतकालीन निवास मुखबा में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
3. ‘सनातन शहरों’ की ओर कदम
उत्तराखंड सरकार राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों को उनकी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ढालने पर विचार कर रही है।
- हरिद्वार और ऋषिकेश: हरिद्वार के गंगा घाटों पर भी इसी तरह के प्रतिबंध की मांग तेज हो गई है। 1916 के नगर पालिका नियमों का हवाला देते हुए ‘हर की पैड़ी’ क्षेत्र में पहले ही ‘गैर-हिंदू वर्जित’ के बोर्ड लगाए जा चुके हैं।
- अर्धकुंभ 2026-27: आगामी अर्धकुंभ के मद्देनजर पूरे मेला क्षेत्र को ‘हिंदू क्षेत्र’ घोषित करने की मांग पर शासन स्तर पर मंथन जारी है।
विपक्ष और प्रतिक्रिया
जहाँ एक ओर संतों और तीर्थ पुरोहितों ने इस फैसले का स्वागत किया है, वहीं विपक्षी दलों (जैसे कांग्रेस) ने इसे ‘ध्यान भटकाने वाली रणनीति’ करार दिया है। उनका कहना है कि हिंदू आस्था के केंद्रों में सामान्यतः गैर-हिंदू प्रवेश नहीं करते, इसलिए ऐसे औपचारिक प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं थी।


