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    ‘इंडिया’ की बैठक से पहले मतभेद सामने आए, CPIM ने कांग्रेस को घेरा, DMK का बहिष्कार

    नयी दिल्ली में होने वाली ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन की अहम बैठक से ठीक पहले विपक्षी खेमे में आपसी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। गठबंधन के भीतर विभिन्न क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच बढ़ती अंदरूनी कलह ने आगामी रणनीतियों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। इस बार दरार की मुख्य वजह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) द्वारा कांग्रेस से सीधे जवाब मांगना और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) द्वारा तृणमूल कांग्रेस (TMC) के रुख को लेकर बैठक से दूरी बनाना है।

    CPIM ने कांग्रेस को घेरा: पश्चिम बंगाल और केरल का विवाद

    गठबंधन की बैठक से पहले सीपीआईएम ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से कई नीतिगत फैसलों पर स्पष्टीकरण मांगा है।

    • सीटों का तालमेल: पश्चिम बंगाल और केरल में स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच जारी राजनीतिक खींचतान अब राष्ट्रीय स्तर पर भारी पड़ रही है। सीपीआईएम का आरोप है कि कांग्रेस राज्य स्तर पर गठबंधन के सिद्धांतों का पालन नहीं कर रही है।
    • नेतृत्व पर सवाल: सीपीआईएम के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जब तक कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को उचित सम्मान और स्वायत्तता नहीं देती, तब तक गठबंधन को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना मुश्किल होगा। उन्होंने कांग्रेस से इस पर तुरंत अपना रुख साफ करने को कहा है।

    डीएमके का कड़ा रुख: बैठक का किया बहिष्कार

    गठबंधन को दूसरा बड़ा झटका दक्षिण भारत से लगा है, जहां तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके (DMK) ने इस महत्वपूर्ण बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार करने का फैसला किया है।

    • TMC से नाराजगी: सूत्रों के मुताबिक, डीएमके नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस (TMC) के हालिया बयानों और गठबंधन के भीतर उनके एकतरफा रवैये से बेहद नाराज है।
    • क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग: डीएमके का मानना है कि कुछ दल गठबंधन के सामूहिक फैसलों को दरकिनार कर अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को थोपने की कोशिश कर रहे हैं। इस आंतरिक राजनीति के विरोध में डीएमके ने बैठक में शामिल न होने का कड़ा संदेश दिया है।

    अन्य क्षेत्रीय दलों में भी सुगबुगाहट

    सिर्फ सीपीआईएम और डीएमके ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी (AAP) और समाजवादी पार्टी (SP) के भीतर भी कुछ मुद्दों को लेकर असंतोष की खबरें हैं। हालांकि इन दलों ने बैठक का बहिष्कार नहीं किया है, लेकिन वे सीटों के बंटवारे और भविष्य के राष्ट्रीय एजेंडे को लेकर कांग्रेस के ढुलमुल रवैये से असहज महसूस कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बैठक से पहले इन प्रमुख सहयोगियों को नहीं मनाया गया, तो भाजपा के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट मोर्चा खड़ा करने की विपक्ष की मुहिम को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। अब सभी की नजरें कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हैं कि वे इस बढ़ती दरार को भरने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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