भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और ओडिशा की पुरी लोकसभा सीट से सांसद संबित पात्रा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश के बीच सोशल मीडिया पर एक तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है। इस बहस के दौरान संबित पात्रा ने 16 साल पुरानी एक घटना का जिक्र करते हुए कांग्रेस पर जोरदार पलटवार किया है। पात्रा ने दावा किया कि साल 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम बेचने से साफ इनकार कर दिया था। आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और संबित पात्रा को अचानक इतिहास के इस पन्ने को पलटने की जरूरत क्यों पड़ी।
विवाद की शुरुआत: जयराम रमेश का दावा
इस राजनीतिक विवाद की शुरुआत कांग्रेस नेता जयराम रमेश के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। जयराम रमेश ने दावा किया कि वर्तमान की भाजपा नीत मोदी सरकार साल 2008 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान बने कानून और ऐतिहासिक फैसलों का श्रेय लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने संकेत दिया कि भारत के लिए यूरेनियम की आपूर्ति और सिविल न्यूक्लियर डील का रास्ता UPA के कार्यकाल में ही साफ हो गया था।
संबित पात्रा का तीखा पलटवार
जयराम रमेश के इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने उन्हें ‘चुनिंदा इतिहास’ से देश को गुमराह न करने की सलाह दी। पात्रा ने कहा:
“नकली क्रेडिट लेने के लिए मनगढ़ंत स्क्रिप्ट लिखने के बजाय, आपको (जयराम रमेश) अपने UPA के समय की सच्ची बातें देखनी चाहिए। अगर आपकी तथाकथित ऐतिहासिक डील ने भारत के लिए यूरेनियम सप्लाई पहले ही पक्की कर दी थी, तो ऑस्ट्रेलिया ने 2010 में भारत को यूरेनियम बेचने से साफ मना क्यों कर दिया था?”
पीएम मोदी के नेतृत्व को बताया ‘निर्णायक’
संबित पात्रा ने आगे कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच परमाणु सहयोग की असल शुरुआत 2014 के बाद हुई। उन्होंने कहा कि साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व में ही भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ ऐतिहासिक ‘सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट’ (Civil Nuclear Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते के बाद ही दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन में एक नए और मजबूत अध्याय की शुरुआत हुई। कांग्रेस पर तंज कसते हुए पात्रा ने अंत में लिखा, “कांग्रेस पार्टी केवल टॉकिंग पॉइंट (बातें) बनाती है, जबकि पीएम मोदी नतीजे (परिणाम) देते हैं।”
इस बयान के बाद दोनों दलों के बीच एक बार फिर विदेशी नीति और ऐतिहासिक परमाणु समझौतों के क्रेडिट को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।


