पाकिस्तान में चीन के साथ रिश्तों को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख और वरिष्ठ सांसद मौलाना फजलुर रहमान ने दावा किया है कि चीन बलूचिस्तान में कुछ माइनिंग प्रोजेक्ट से पीछे हट रहा है और वह पाकिस्तान सरकार के रवैये से खुश नहीं है। उनके इस बयान ने दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे करीबी संबंधों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चीन से रिश्तों पर क्यों उठे सवाल?
मौलाना फजलुर रहमान, जिन्हें पाकिस्तान में ‘मौलाना डीजल’ के नाम से भी जाना जाता है, इन दिनों शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य नेतृत्व के खिलाफ लगातार मुखर हैं। उन्होंने एक कार्यक्रम में बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों और वहां चल रही परियोजनाओं को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि चीन बलूचिस्तान की स्थिति और पाकिस्तान के रवैये से संतुष्ट नहीं है तथा माइनिंग परियोजनाओं से अपने कदम पीछे खींच रहा है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि चीन के सभी बलूचिस्तान माइनिंग प्रोजेक्ट से पीछे हटने की कोई स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। उलटे, बलूचिस्तान सरकार की हालिया जानकारी में चीनी कंपनी द्वारा सियाह डिक परियोजना की अपडेटेड फिजिबिलिटी स्टडी का उल्लेख किया गया है। परियोजना में करीब 2 अरब डॉलर के निवेश और लंबे समय तक खनन की योजना बताई गई है।
रेको डिक और सैंदक पर भी निशाना
फजलुर रहमान ने बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों से स्थानीय लोगों को पर्याप्त लाभ नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने रेको डिक परियोजना को लेकर सवाल किया कि वहां खनन कौन कर रहा है और प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाला लाभ आखिर कहां जा रहा है।
उन्होंने सैंदक परियोजना के कामकाज पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि कई दशकों तक काम होने के बावजूद परियोजना से अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुए। फजलुर रहमान ने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान की खनिज संपदा का फायदा आम जनता तक नहीं पहुंच रहा है।
सुरक्षा बनी चीन की सबसे बड़ी चिंता
बलूचिस्तान में चीनी निवेश के सामने सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। हाल के वर्षों में चीन से जुड़े प्रोजेक्ट और चीनी नागरिक आतंकवादी हमलों का निशाना रहे हैं। जुलाई 2026 में चीनी संचालित सैंदक कॉपर-गोल्ड परियोजना के आसपास सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई थी। हालांकि परियोजना के प्रबंधन ने उस समय काम बंद होने की खबरों को गलत बताया था और पाकिस्तान ने सुरक्षा बढ़ाने का भरोसा दिया था।
विशेषज्ञों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बलूचिस्तान चीन के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का अहम हिस्सा है। यहां बंदरगाह, ऊर्जा और खनन से जुड़े कई रणनीतिक हित जुड़े हैं। लगातार जारी हिंसा और स्थानीय असंतोष चीन के निवेश के लिए जोखिम बढ़ा रहे हैं।
‘पहले घर की आग बुझाइए’
फजलुर रहमान ने पाकिस्तान सरकार को प्रांतों के पुनर्गठन और राजनीतिक मुद्दों पर भी घेरा। उन्होंने कहा कि जब देश के अलग-अलग हिस्सों में समस्याएं और अस्थिरता बनी हुई है, तब सरकार को पहले “घर की आग” बुझाने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने सेना प्रमुख असीम मुनीर की बढ़ती राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि शहबाज शरीफ सरकार की शक्तियां लगातार सैन्य नेतृत्व की ओर जा रही हैं।
कुल मिलाकर, फजलुर रहमान का दावा पाकिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव, बलूचिस्तान के संसाधनों और सुरक्षा संकट पर चल रही बहस को सामने लाता है। लेकिन फिलहाल इसे चीन के पाकिस्तान से रिश्ते खत्म करने या बड़े पैमाने पर निवेश वापस लेने का पक्का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनी हुई है, जबकि बलूचिस्तान में सुरक्षा और स्थानीय हिस्सेदारी को लेकर सवाल लगातार बने हुए हैं।


