राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने जाति जनगणना के संवेदनशील मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने एक महत्वपूर्ण बयान में कहा है कि जाति जनगणना का उपयोग समाज के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ या समाज को बांटने के लिए।
संघ के इस दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. लोक कल्याण बनाम राजनीति
RSS का मानना है कि यदि जातिगत डेटा का उपयोग समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान और सरकारी योजनाओं को सही लाभार्थियों तक पहुँचाने के लिए किया जाता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। हालांकि, आंबेकर ने चेतावनी दी कि इसका इस्तेमाल ‘चुनावी टूल’ के रूप में समाज में दरार पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए।
2. सामाजिक समरसता पर जोर
संघ की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जाति जनगणना से समाज में विद्वेष बढ़ सकता है।
- समाज की एकता: RSS का मूल मंत्र ‘सामाजिक समरसता’ है। संघ का कहना है कि जाति जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
- राजनीतिक दलों को नसीहत: संघ ने परोक्ष रूप से उन राजनीतिक दलों पर निशाना साधा है जो जाति जनगणना को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बना रहे हैं।
3. डेटा की गोपनीयता और संवेदनशीलता
बयान में यह भी संकेत दिया गया है कि जाति से जुड़े आंकड़े अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इनका रखरखाव और उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि देश की अखंडता पर कोई आंच न आए।
4. संघ की बदली हुई रणनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि संघ का यह बयान एक ‘मध्यम मार्ग’ (Middle Path) की तरह है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है, वहीं संघ ने ‘कल्याण’ की शर्त रखकर इसे सिरे से खारिज करने के बजाय अपनी शर्तों के साथ स्वीकार्यता दिखाई है। इससे सरकार को भी इस मुद्दे पर रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है।


