पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच दोबारा गठबंधन की अटकलों के बीच, बीजेपी ने अपनी स्थिति मजबूत करते हुए अकाली दल के सामने नई शर्तें रख दी हैं। अब गेंद पूरी तरह से अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के पाले में है।
बीजेपी के बुलंद हौसलों के प्रमुख कारण
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनावी नतीजों के आधार पर बीजेपी पंजाब में अपनी स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत मान रही है:
- वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी: 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़कर 18.56% वोट हासिल किए थे, जबकि अकाली दल को 13.42% वोट ही मिले थे।
- स्थानीय निकाय चुनावों में बढ़त: 2026 के निकाय चुनावों में बीजेपी की सीटें 42 से बढ़कर 172 तक पहुंच गईं, जिससे उसकी जमीनी पकड़ मजबूत हुई है।
- बूथ स्तर पर मजबूती: बीजेपी ने राज्य के 15,000 से अधिक बूथों पर अपनी कमेटियां गठित कर ली हैं और सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
अकाली दल के सामने बीजेपी का ‘बिहार फॉर्मूला’
बीजेपी अब पुराने गठबंधन फॉर्मूले (जिसमें अकाली दल 94 और बीजेपी 23 सीटों पर लड़ती थी) को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
| मापदंड | पुराना फॉर्मूला (2017) | बीजेपी की नई मांग (2027) |
| सीटों का बंटवारा | SAD: 94 सीटें | BJP: 23 सीटें | ‘बिहार फॉर्मूला’: बीजेपी मुख्य भूमिका/बराबर या अधिक सीटों पर दावेदारी। |
| नेतृत्व का रुख | अकाली दल ‘बड़ा भाई’ | बीजेपी ‘बड़े भाई’ की भूमिका में। |
बीजेपी का मानना है कि पिछले 6 सालों में पार्टी के जनाधार का विस्तार हुआ है, इसलिए वह राज्य में छोटे घटक दल के रूप में समझौता नहीं करेगी।
सुखबीर बादल के सामने धर्मसंकट
अकाली दल के लिए 2027 का चुनाव अस्तित्व की लड़ाई माना जा रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में महज 3 सीटें जीतने और वोट बैंक में आई गिरावट के कारण अकाली दल पर बीजेपी के साथ दोबारा जुड़ने का दबाव है। यदि अकाली दल बीजेपी की शर्तें स्वीकार करता है तो पार्टी के भीतर सीट कुर्बान करने वाले नेताओं में नाराजगी और कट्टरपंथी धड़ों में जाने का खतरा रहेगा। वहीं, अकेले लड़ने पर त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले का सीधा फायदा सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) या कांग्रेस को हो सकता है। अब यह देखना होगा कि सुखबीर सिंह बादल बीजेपी की शर्तों को मानकर ‘छोटे भाई’ की भूमिका स्वीकार करते हैं या अकेले दम पर मैदान में उतरते हैं।


