पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ा सैन्य संघर्ष अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। एक तरफ जहां अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर लगातार 10वें दिन भीषण बमबारी जारी रखी है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक स्तर पर तनाव कम करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। संकट के बीच ईरान के गृह मंत्री इस्लामाबाद पहुंचे हैं, जहां पाकिस्तान और कतर के माध्यम से शांति वार्ता की उम्मीद जताई जा रही है।
अमेरिका की लगातार 10वें दिन एयरस्ट्राइक
फारस की खाड़ी और हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव चरम पर है।
सैन्य ठिकानों पर हमले: अमेरिकी वायुसेना और नौसेना ने ईरान के दक्षिणी प्रांतों, बंदरगाहों, सैन्य अड्डों और मिसाइल लॉन्च पैड्स को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ हमले किए हैं।
- जवाबी कार्रवाई: ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने भी जोर्डन, इराक और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों और वाणिज्यिक जहाजों पर ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइलों से पलटवार किया है।
- जवानों की शहादत से भड़का अमेरिका: हालिया हमलों में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ नौसैनिक घेराबंदी और सख्त कार्रवाई के आदेश जारी किए हैं।
कूटनीतिक हल की तलाश: ईरान के मंत्री पहुंचे पाकिस्तान
ईरान के गृह मंत्री इस्कंदर मोमेनी पाकिस्तान पहुंचे हैं। पाकिस्तान और कतर दोनों देश अमेरिका और तेहरान के बीच सीजफायर कराने और तनाव घटाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ता में अमेरिका और ईरान को फिर से बातचीत की मेज पर लाने और हॉरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल करने के फॉर्मूले पर चर्चा की गई है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट
हॉरमुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। इस समुद्री मार्ग पर हमलों और नाकेबंदी के कारण: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ओमान, यूएई, बहरीन और इजराइल समेत पूरा क्षेत्र वाणिज्यिक जहाजों के रूट बदलने और शिपिंग इंश्योरेंस महंगा होने से प्रभावित हो रहा है।
शांति की राह कितनी कठिन?
हालाँकि पाकिस्तान में राजनयिक स्तर पर वार्ता की कोशिशें जारी हैं, लेकिन दोनों पक्षों के कड़े रुख को देखते हुए तुरंत पूर्ण संघर्षविराम होना आसान नहीं दिख रहा। दुनिया भर की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस्लामाबाद की यह मध्यस्थता पश्चिम एशिया को एक भयावह महायुद्ध में जाने से बचा पाएगी।


