पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के बीच भारत ने अपनी शानदार कूटनीतिक पकड़ का प्रदर्शन किया है। जहाँ एक ओर लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) बाधित हुई है, वहीं भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में सफल रहा है।
एलपीजी (LPG) संकट और भारत की रणनीति
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण भारत में रसोई गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। इसके बावजूद, भारत की “बहुपक्षीय कूटनीति” (Multi-aligned Diplomacy) रंग लाई है:
- रूस के बाद अमेरिका से मदद: रूस से निरंतर आपूर्ति के बाद, अब अमेरिका से भी एलपीजी से भरा एक विशाल जहाज मंगलुरु बंदरगाह पहुँचा है।
- आपूर्ति में निरंतरता: खाड़ी देशों में जारी मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच यह आपूर्ति भारत की मजबूत वैश्विक साख को दर्शाती है।
भारत की कूटनीतिक ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने जिस तरह से अमेरिका और रूस—जो स्वयं कई मुद्दों पर एक-दूसरे के विपरीत हैं—दोनों के साथ संतुलन बनाए रखा है, वह उसकी विदेश नीति की बड़ी सफलता है।
- ऊर्जा विविधीकरण: केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय भारत ने रूस और अमेरिका जैसे विकल्पों को मजबूत किया है।
- सुरक्षित समुद्री मार्ग: भारतीय नौसेना की अरब सागर और हिंद महासागर में बढ़ती सक्रियता ने व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा का भरोसा दिया है।
मंगलुरु पोर्ट पर हलचल
मंगलुरु के बंदरगाह पर अमेरिकी जहाज का पहुँचना इस बात का संकेत है कि घरेलू बाजार में एलपीजी की कमी नहीं होने दी जाएगी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, आगामी महीनों के लिए भी पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने हेतु वैकल्पिक मार्गों और नए साझेदारों से बातचीत जारी है।
पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है, लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का उपयोग करते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखा है।


