मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा’ 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन पहली बार साथ नजर आ रहे हैं। करीब 2 घंटे 33 मिनट लंबी यह फिल्म क्राइम, थ्रिलर और ड्रामा के जरिए कानून, न्याय और पुलिस कार्रवाई के बीच खड़े मुश्किल सवालों को सामने रखती है। फिल्म की कहानी दिसंबर 2019 में हैदराबाद में हुए चर्चित रेप-हत्या मामले और उसके बाद आरोपियों के एनकाउंटर से प्रेरित है।
क्या है ‘दायरा’ की कहानी?
कहानी एक युवती के साथ गैंगरेप और उसकी हत्या से शुरू होती है। पुलिस चार आरोपियों को गिरफ्तार करती है और उनके अपराध कबूल करने की बात सामने आती है। इसके बाद चारों आरोपी एनकाउंटर में मारे जाते हैं। जहां एक तरफ इसे तत्काल न्याय के तौर पर देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर मुठभेड़ की वैधता और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठते हैं।
मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित होती है, जिसकी जिम्मेदारी डीसीपी अजूनी कोहली यानी करीना कपूर के हाथों में आती है। उन्हें शक है कि यह आत्मरक्षा में हुई मुठभेड़ नहीं, बल्कि सुनियोजित कार्रवाई थी। दूसरी तरफ डीसीपी रमन कुमार यानी पृथ्वीराज सुकुमारन का मानना है कि अपराधियों को उनके किए की सजा मिलनी चाहिए। यहीं से दोनों किरदारों के बीच कानून और तत्काल न्याय को लेकर वैचारिक टकराव शुरू होता है।
पहला हाफ ज्यादा असरदार
फिल्म का पहला हिस्सा जांच-पड़ताल, पुलिस कार्रवाई और पीड़ित परिवार के दर्द को प्रभावी तरीके से सामने लाता है। एफआईआर दर्ज कराने से लेकर आरोपियों तक पहुंचने की प्रक्रिया में व्यवस्था की मुश्किलों को दिखाया गया है। कहानी की गति भी इस हिस्से में बनी रहती है और दर्शक लगातार आगे क्या होगा, यह जानने के लिए जुड़े रहते हैं।
लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म का फोकस ज्यादा वैचारिक हो जाता है। कानून बनाम तत्काल न्याय का सवाल कहानी का केंद्र बनता है। यही हिस्सा कई जगह अपेक्षित गहराई हासिल नहीं कर पाता। करीना और पृथ्वीराज के किरदारों के बीच जिस वैचारिक संघर्ष को स्थापित किया गया है, उसे ज्यादा समय और विस्तार मिलता तो कहानी का केंद्रीय सवाल और मजबूती से उभर सकता था।
पृथ्वीराज और करीना का अभिनय
पृथ्वीराज सुकुमारन पुलिस अधिकारी रमन के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। उनके किरदार में गुस्सा है, लेकिन वह हर समय सतही तरीके से सामने नहीं आता। संयमित अभिनय के जरिए वह अपने किरदार की सोच और उसके फैसलों के प्रति विश्वास को प्रभावी बनाते हैं।
करीना कपूर खान डीसीपी अजूनी के किरदार में सहज नजर आती हैं। उनका किरदार कानून और प्रक्रिया के दायरे में रहकर जांच आगे बढ़ाता है। हालांकि स्क्रीनप्ले उन्हें उतनी गहराई नहीं देता, जितनी इस महत्वपूर्ण भूमिका को मिल सकती थी।
जितेंद्र जोशी, तृप्ति खामकर और क्षिति जोग भी अपने-अपने किरदारों में प्रभाव छोड़ते हैं। खासकर पीड़िता की मां के दर्द को क्षिति जोग ने संवेदनशीलता से निभाया है।
कहां कमजोर पड़ती है फिल्म?
‘दायरा’ का सबसे बड़ा मुद्दा ही इसकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। फिल्म कानून, न्याय, पुलिस की जवाबदेही और बदले की भावना जैसे कई गंभीर सवाल एक साथ उठाती है, लेकिन दूसरे हिस्से में इन विचारों को समान गहराई से विकसित नहीं कर पाती। जुवेनाइल जस्टिस जैसे संवेदनशील विषय को भी फिल्म छूती है, लेकिन उस पर विस्तार से चर्चा नहीं करती।
फिर भी फिल्म का रियलिस्टिक ट्रीटमेंट और कलाकारों का अभिनय इसे देखने लायक बनाता है। ‘दायरा’ कोई आसान जवाब देने के बजाय कानून और तत्काल न्याय के बीच मौजूद टकराव को सामने रखती है। अगर आप गंभीर क्राइम-ड्रामा और करीना कपूर, पृथ्वीराज सुकुमारन या मेघना गुलजार के काम में रुचि रखते हैं, तो फिल्म आपके लिए चर्चा का विषय जरूर छोड़ती है।


