रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर एक बार फिर अमेरिकी दबाव बढ़ गया है। अमेरिकी कांग्रेस से ऐसा विधेयक पारित हुआ है, जो रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दे सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि 100% टैरिफ अपने आप लागू नहीं हुआ है और इसके लिए आगे की प्रक्रिया जरूरी है। इस घटनाक्रम ने भारत के सामने रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखने या वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ने की चुनौती खड़ी कर दी है। खास बात यह है कि इस बार परिस्थितियां 2025 की तुलना में काफी अलग हैं।
भारत 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध
- विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों से समझौता नहीं करेगा। भारत ने अमेरिकी कांग्रेस में रूस-ईरान प्रतिबंध विधेयक पारित होने पर कहा कि वह घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। MEA के मुताबिक, भारत 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने कहा कि तेल की खरीद स्रोतों में विविधता और बदलती वैश्विक बाजार परिस्थितियों के आधार पर जारी रखी जाएगी।
- भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट किया है कि इस कदम का असर केवल दोनों देशों के रिश्तों पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। नई दिल्ली ने कहा है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगी और इस मामले में भारतीय व्यापार एवं उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी।
पिछली बार 25% टैरिफ के बावजूद जारी रही खरीद
अमेरिका ने अगस्त 2025 में रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। उस समय भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में कटौती करने के बजाय टैरिफ की लागत वहन करना जारी रखा था। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति सामान्य थी और जरूरत पड़ने पर वहां से अतिरिक्त कच्चा तेल हासिल करना अपेक्षाकृत आसान था।
लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित हुई है। सऊदी अरब की कुछ आपूर्ति भी हाल में एक महत्वपूर्ण पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद प्रभावित हुई। ऐसे में भारत के लिए रूस से आने वाले बड़े तेल प्रवाह को अचानक दूसरे देशों से बदलना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रूस की जगह कौन देगा तेल?
भारतीय रिफाइनरों के सामने सबसे बड़ी समस्या वैकल्पिक कच्चे तेल की उपलब्धता और उसकी कीमत है। पिछले कुछ महीनों में भारत के कच्चे तेल आयात में रूस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की हिस्सेदारी मिलकर करीब दो-तिहाई रही है। ऐसे में रूस से आने वाली बड़ी मात्रा को एक साथ हटाने पर दूसरे उत्पादकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, अगर भारत समेत कई देश एक साथ वैकल्पिक तेल खरीदने निकलते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके अलावा टैंकरों की उपलब्धता भी समस्या बन सकती है, क्योंकि शिपिंग लागत पहले से ऊंचे स्तर पर है। रिपोर्ट के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है।
भारत की मुश्किल सिर्फ तेल खरीदने तक सीमित नहीं
रूसी तेल की खासियत केवल इसकी उपलब्धता नहीं, बल्कि इसकी कीमत और भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसकी अनुकूलता भी है। रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरों को लागत प्रबंधन में मदद की है। अगर इसकी जगह महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो इसका असर रिफाइनिंग मार्जिन और देश के कुल आयात बिल पर पड़ सकता है। भारत सरकार ने कहा है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा है और वह बदलती परिस्थितियों के अनुसार तेल के स्रोतों में विविधता बनाए रखेगी। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
इसलिए मौजूदा स्थिति में भारत के लिए चुनौती दोहरी है—एक तरफ अमेरिकी टैरिफ का संभावित दबाव और दूसरी तरफ रूसी तेल की जगह तत्काल पर्याप्त और सस्ता विकल्प जुटाने की कठिनाई। 100% टैरिफ की अधिकतम सीमा वाला कानून अभी अपने आप भारत पर यह शुल्क लागू नहीं करता, लेकिन इससे भारत की ऊर्जा खरीद और अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों पर दबाव जरूर बढ़ गया है।


