लेबनान में जारी राजनीतिक और सुरक्षा संकट के बीच गुरुवार, 17 सितंबर को पेरिस में एक अहम बैठक होने जा रही है। इसमें फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन और जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय शामिल होंगे। बैठक का मुख्य उद्देश्य आर्थिक संकट से जूझ रही लेबनानी सेना के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना और दक्षिणी लेबनान में संभावित सुरक्षा संकट से निपटने की तैयारी करना है।
क्यों बुलाई गई है यह बैठक?
लेबनान की सेना लंबे समय से आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। 2019 में शुरू हुए गंभीर आर्थिक संकट ने सरकारी संस्थानों और सेना की वित्तीय स्थिति को भी कमजोर किया। सैनिकों की सैलरी और जरूरी सैन्य संसाधनों की कमी के कारण सेना की क्षमता प्रभावित हुई है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेबनानी सेना को फंड, हथियार, वाहन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की योजना पर चर्चा होनी है।
दरअसल, लेबनानी सेना के लिए एक डोनर कॉन्फ्रेंस पहले फरवरी में प्रस्तावित थी। फ्रांस, सऊदी अरब और अमेरिका को इसकी अगुवाई करनी थी, लेकिन ईरान युद्ध और इजरायल-हिजबुल्ला संघर्ष के नए दौर के कारण इसे टाल दिया गया था। अब पेरिस बैठक को भविष्य की इस डोनर कॉन्फ्रेंस की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।
दक्षिणी लेबनान सबसे बड़ी चुनौती
बैठक में दक्षिणी लेबनान की स्थिति प्रमुख मुद्दा होगी। जून में लेबनान और इजरायल के बीच एक फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा हुई थी। इसके तहत इजरायली सेना को धीरे-धीरे दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना है और वहां लेबनानी सेना को नियंत्रण संभालना है। इसके साथ हिजबुल्ला के हथियारों को हटाने की व्यवस्था भी समझौते का हिस्सा थी। हालांकि, इस प्रक्रिया में अभी ठोस प्रगति नहीं हो पाई है।
लेबनानी सरकार के लिए यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है। सेना और हिजबुल्ला के बीच सीधे टकराव की स्थिति पैदा होने पर देश में आंतरिक संघर्ष का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सरकार एक ऐसी व्यवस्था चाहती है जिसमें सेना की क्षमता बढ़े और पूरे देश में उसका नियंत्रण मजबूत हो।
UNIFIL के भविष्य पर भी नजर
पेरिस बैठक में संयुक्त राष्ट्र की अंतरिम शांति सेना UNIFIL के भविष्य पर भी चर्चा होगी। उसका मौजूदा जनादेश वर्ष के अंत में समाप्त होना है और जनवरी 2027 से उसकी मौजूदगी में कमी शुरू होने की योजना है। करीब 7,500 शांति सैनिकों वाली इस व्यवस्था के बाद दक्षिणी लेबनान में सुरक्षा का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
फ्रांस और लेबनान UNIFIL के जनादेश को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं, लेकिन इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनना अभी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में बैठक में वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भी विचार हो सकता है।
क्या खत्म होगा लेबनान का संकट?
पेरिस बैठक से तत्काल संकट खत्म होने की गारंटी नहीं है, लेकिन यह लेबनानी सेना को मजबूत करने, दक्षिणी क्षेत्र की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मदद के लिए आगे की रणनीति तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में डोनर कॉन्फ्रेंस के जरिए सेना को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने और क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश की जा सकती है।


