आज दुनिया स्टीव जॉब्स को एपल के सह-संस्थापक और तकनीकी दुनिया में क्रांति लाने वाले शख्स के तौर पर जानती है। लेकिन एपल की नींव रखने से पहले उनकी जिंदगी का एक दौर ऐसा भी था, जब वह तकनीक से ज्यादा आध्यात्मिकता और आत्म-खोज की तलाश में भारत पहुंचे थे। साल 1974 में जॉब्स भारत आए और उनका एक प्रमुख उद्देश्य नीम करौली बाबा से मिलना था। यही कहानी अब फिल्म ‘हनुमान अंश’ की चर्चा के बीच फिर सामने आई है।
आखिर भारत क्यों आए थे स्टीव जॉब्स?
स्टीव जॉब्स उस समय करीब 19 साल के थे। वह पारंपरिक करियर और भौतिक सफलता से आगे जीवन का अर्थ समझना चाहते थे। आध्यात्मिकता में उनकी रुचि बढ़ चुकी थी और इसी तलाश ने उन्हें भारत की ओर खींचा। उनके दोस्त डेनियल कोट्टके भी इस यात्रा में उनके साथ थे।
जॉब्स नीम करौली बाबा यानी महाराजजी से मिलने की इच्छा लेकर भारत पहुंचे थे। बाबा की शिक्षाओं के बारे में उन्हें राम दास की किताब ‘Be Here Now’ के जरिए जानकारी मिली थी। इस किताब ने पश्चिमी दुनिया में नीम करौली बाबा और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को जानने की उत्सुकता पैदा की थी।
हालांकि यहां कहानी में एक बेहद दिलचस्प मोड़ आता है। जब जॉब्स कैंची आश्रम पहुंचे, तब तक नीम करौली बाबा का सितंबर 1973 में निधन हो चुका था। यानी जॉब्स उनसे व्यक्तिगत रूप से मुलाकात नहीं कर सके। इसके बावजूद आश्रम और वहां का आध्यात्मिक वातावरण उनकी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
सात महीने की भारत यात्रा ने क्या बदला?
जॉब्स ने भारत में लगभग सात महीने बिताए। इस दौरान उन्होंने आश्रमों और ग्रामीण इलाकों में समय गुजारा और सादगी के करीब जाने की कोशिश की। उनकी यह यात्रा किसी सामान्य पर्यटक की यात्रा नहीं थी, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक खोज का दौर थी।
भारत से लौटने के बाद जॉब्स के व्यक्तित्व और सोच में बदलाव की चर्चा होती रही। उन्होंने सादगी, ध्यान और अंतर्ज्ञान को अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया। बाद के वर्षों में यही दृष्टिकोण उनके उत्पादों को लेकर सोच में भी दिखाई दिया—कम चीजों में ज्यादा उपयोगिता, साफ डिजाइन और अनावश्यक जटिलता से दूरी।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि एपल की सफलता सीधे नीम करौली बाबा की किसी एक शिक्षा का परिणाम थी। एपल के तकनीकी विकास में स्टीव वॉजनिएक की इंजीनियरिंग क्षमता, होमब्रू कंप्यूटर क्लब, माइक्रो कंप्यूटर क्रांति और कई दूसरे कारकों की बड़ी भूमिका थी। जॉब्स की भारत यात्रा को उनकी सोच और व्यक्तित्व के विकास से जोड़कर देखना ज्यादा उचित है।
‘हनुमान अंश’ को यहीं से मिली कहानी?
नीम करौली बाबा का जीवन और उनकी हनुमान भक्ति अब ‘हनुमान अंश’ फिल्म के जरिए बड़े पर्दे पर पहुंचा है। फिल्म बाबा के जीवन, उनकी आध्यात्मिक शिक्षाओं, प्रेम, सेवा और भक्ति पर केंद्रित है। फिल्म को करीब दो करोड़ रुपये के बजट में बनाए जाने और कम बजट के बावजूद बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल करने की वजह से भी चर्चा मिली है।
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नागर के लिए भी स्टीव जॉब्स इस कहानी तक पहुंचने की कड़ी बने। रिपोर्टों के मुताबिक 21 वर्षीय अनुप्रिया ने एक असाइनमेंट के दौरान स्टीव जॉब्स पर शोध किया। इसी दौरान उन्हें जॉब्स और नीम करौली बाबा के संबंध के बारे में पता चला। इसके बाद उन्होंने बाबा के जीवन और उनके प्रभाव पर गहराई से काम किया और यही शोध आगे चलकर ‘हनुमान अंश’ की प्रेरणा बना। यानी एक दिलचस्प सिलसिला बनता है—नीम करौली बाबा ने स्टीव जॉब्स को प्रभावित किया, जॉब्स की कहानी ने अनुप्रिया नागर को प्रेरित किया और उस प्रेरणा से ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म बनी।
नीम करौली बाबा से कौन-कौन प्रभावित हुए?
नीम करौली बाबा का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। स्टीव जॉब्स के अलावा फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का नाम भी उनके प्रमुख विदेशी अनुयायियों और उनसे प्रभावित लोगों में लिया जाता है। हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स ने भी बाबा की आध्यात्मिक शिक्षाओं से प्रभावित होने की बात कही है।
यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ सिर्फ एक संत की जीवन-कथा वाली फिल्म नहीं रह गई। इसके साथ टेक्नोलॉजी, बॉलीवुड और आध्यात्मिकता की तीन अलग-अलग दुनिया जुड़ गई हैं।
कहानी का सबसे बड़ा संदेश
स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा को अगर ‘हनुमान अंश’ के संदर्भ में देखें तो इसका सबसे अहम पहलू यह है कि सफलता की तलाश में निकला एक युवा पहले खुद को तलाशने भारत आया था। वह जिस संत से मिलने पहुंचा, उनसे मुलाकात तो नहीं हो सकी, लेकिन उस यात्रा और आध्यात्मिक वातावरण का प्रभाव उसके जीवन में लंबे समय तक बना रहा। इसी वजह से आज जब ‘हनुमान अंश’ दर्शकों के बीच चर्चा में है, तो फिल्म के साथ स्टीव जॉब्स और कैंची धाम की कहानी भी दोबारा सुर्खियों में है।


