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    इसरो की बड़ी छलांग, EOS-05 लॉन्च, धरती के हर बदलाव पर होगी नजर, ऐसे करेगा काम?

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 4 सितंबर 2026 की तड़के श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। खास बात यह है कि EOS-05 भारत का पहला ऐसा समर्पित इमेजिंग सैटेलाइट है, जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की निगरानी के लिए तैयार किया गया है। करीब 2,367 किलोग्राम वजनी यह उपग्रह पृथ्वी से लगभग 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करेगा।

    क्या है EOS-05?

    EOS-05 एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष से पृथ्वी की तस्वीरें और उससे जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा जुटाना है। हालांकि इसे केवल सामान्य तस्वीरें लेने वाला उपग्रह समझना सही नहीं होगा। इसके सेंसर से मिलने वाले डेटा की मदद से जमीन, वनस्पति, फसल, जल क्षेत्र और आपदा प्रभावित इलाकों में हो रहे बदलावों को समझने में मदद मिलेगी।

    मसलन, किसी क्षेत्र में बाढ़ आने पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पानी कितने बड़े इलाके में फैला है। जंगल में आग लगने पर प्रभावित क्षेत्र और आग के फैलाव की निगरानी की जा सकती है। कृषि क्षेत्र में फसलों की स्थिति और वनस्पति में बदलाव का आकलन किया जा सकता है।

    36 हजार किमी ऊपर क्यों भेजा गया?

    EOS-05 की सबसे बड़ी खासियत इसकी कक्षा है। इसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया जाना है, जो पृथ्वी की सतह से करीब 35,786 किलोमीटर ऊपर होती है। इस कक्षा में उपग्रह की गति पृथ्वी के घूर्णन के साथ तालमेल में रहती है। इसका फायदा यह है कि उपग्रह पृथ्वी के एक बड़े हिस्से को लगातार देखने की क्षमता हासिल कर सकता है।

    आमतौर पर लो अर्थ ऑर्बिट में घूमने वाले अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट किसी स्थान के ऊपर से गुजरते समय उसकी तस्वीर लेते हैं। इसलिए किसी एक इलाके की लगातार निगरानी संभव नहीं होती। इसके मुकाबले EOS-05 बड़े क्षेत्र पर अधिक लगातार नजर रखने में सक्षम होगा।

    रॉकेट सीधे अंतिम कक्षा में नहीं पहुंचाएगा

    EOS-05 को GSLV-F17 रॉकेट के जरिए पहले सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट यानी सब-GTO में पहुंचाया गया। यह एक अंडाकार कक्षा होती है। इसकी पेरिजी करीब 170 किलोमीटर और एपोजी लगभग 28,934 किलोमीटर है।

    इसके बाद उपग्रह का अपना प्रोपल्शन सिस्टम काम करेगा। इंजन को कई बार चलाकर उसकी गति और कक्षा में बदलाव किया जाएगा। धीरे-धीरे इसकी ऊंचाई बढ़ाई जाएगी और इसे अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट तक पहुंचाया जाएगा। यानी रॉकेट का काम उपग्रह को शुरुआती ट्रांसफर ऑर्बिट तक पहुंचाना है, जबकि अंतिम कक्षा तक की यात्रा EOS-05 अपने प्रणोदन तंत्र से पूरी करेगा।

    मौसम से लेकर खेती तक में आएगा काम

    EOS-05 से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। इनमें मौसम और पर्यावरण की निगरानी प्रमुख हैं। चक्रवात की स्थिति और उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों को समझने में इससे मदद मिल सकती है। बाढ़, जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ताजा इमेजरी बचाव और राहत अभियानों के लिए उपयोगी हो सकती है।

    कृषि में फसलों की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है। वहीं लंबे समय में जमीन और हरित क्षेत्र में हो रहे बदलावों का अध्ययन भी संभव होगा।

    राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अहम

    इस मिशन का रणनीतिक महत्व भी काफी बड़ा है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से लगातार एक बड़े क्षेत्र पर नजर रखने की क्षमता सीमा और संवेदनशील इलाकों की निगरानी में उपयोगी हो सकती है। यही वजह है कि EOS-05 को भारत की अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी के तौर पर देखा जा रहा है।

    EOS-05 का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह 2021 के GISAT-1 मिशन के बाद इसी तरह की क्षमता हासिल करने की दिशा में अगला बड़ा कदम है। इस सफलता के साथ भारत पृथ्वी की लगातार निगरानी और उच्च स्तरीय स्पेस इमेजिंग के क्षेत्र में अपनी क्षमता को और मजबूत कर रहा है।

    EOS-05 सिर्फ अंतरिक्ष में भेजा गया एक और उपग्रह नहीं है। यह मौसम, आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए अंतरिक्ष से लगातार जानकारी उपलब्ध कराने वाली नई क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। लगभग 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई से पृथ्वी के बड़े हिस्से पर नजर रखने की इसकी क्षमता भारत के अर्थ ऑब्जर्वेशन कार्यक्रम को एक नई दिशा दे सकती है।

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