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    UN में दुनिया का नक्शा बदलने का प्रस्ताव, 164 देशों ने की वोटिंग, भारत का समर्थन, अमेरिका ने जताया विरोध

    दुनिया को दशकों से जिस तरह के नक्शे पर देखा जाता रहा है, उसमें बदलाव की दिशा में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बड़ा कदम उठाया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐसे विश्व मानचित्रों को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिनमें महाद्वीपों का आकार वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाई देता है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका अकेला देश रहा जिसने इसका विरोध किया। छह देशों ने मतदान से दूरी बनाई। भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया।

    मर्केटर नक्शे की जगह ‘इक्वल अर्थ’ पर जोर

    इस प्रस्ताव का केंद्र करीब 450 साल पुराना मर्केटर प्रोजेक्शन है। इसे 1569 में फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने मुख्य रूप से समुद्री नौवहन के लिए तैयार किया था। इसमें दिशा और कोणों को बनाए रखना उपयोगी था, लेकिन जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, जमीन के आकार में काफी विकृति दिखाई देती है।

    यही वजह है कि मर्केटर नक्शे पर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड वास्तविकता से कहीं बड़े नजर आते हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं। उदाहरण के तौर पर नक्शे पर ग्रीनलैंड और अफ्रीका का आकार करीब-करीब समान नजर आ सकता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है।

    संयुक्त राष्ट्र समर्थित पहल में Equal Earth projection को अधिक सटीक विकल्प के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। यह प्रक्षेपण महाद्वीपों के क्षेत्रफल के बीच वास्तविक अनुपात को बेहतर तरीके से दिखाता है।

    भारत ने क्यों दिया समर्थन?

    भारत उन 164 देशों में शामिल है, जिन्होंने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। इस पहल का उद्देश्य केवल नक्शे की डिजाइन बदलना नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों को भौगोलिक रूप से अधिक सटीक तरीके से प्रस्तुत करना है। खासतौर पर अफ्रीकी देशों ने लंबे समय से तर्क दिया है कि मौजूदा नक्शे में उनके महाद्वीप का आकार छोटा दिखने से दुनिया की भौगोलिक समझ पर भी असर पड़ता है।

    भारत का समर्थन इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली भौगोलिक प्रतिनिधित्व को ज्यादा वास्तविक और क्षेत्रफल आधारित बनाने की कोशिश के साथ खड़ी है। हालांकि, भारत ने यह स्पष्ट किया है कि उसका वोट किसी एक खास नक्शा-प्रक्षेपण को अनिवार्य रूप से अपनाने के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

    प्रस्ताव को लेकर अमेरिका का रुख बिल्कुल अलग रहा। मतदान में वह एकमात्र देश था जिसने इसके खिलाफ वोट किया। अमेरिकी पक्ष ने इसे व्यावहारिक वैश्विक समस्याओं से हटकर एक वैचारिक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने वाला कदम बताया और संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए।

    हालांकि, प्रस्ताव पारित होने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया भर में अगले दिन से सभी नक्शे बदल जाएंगे। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी फैसला नहीं है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों, शैक्षणिक संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और अन्य संस्थाओं को ज्यादा सटीक क्षेत्रफल वाले नक्शों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।

    सिर्फ नक्शा नहीं, सोच बदलने की कोशिश

    इस पूरे अभियान को केवल कार्टोग्राफी का मामला नहीं माना जा रहा। समर्थकों का कहना है कि नक्शे स्कूलों, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों की दुनिया को देखने की समझ बनाते हैं। इसलिए किसी क्षेत्र का लगातार छोटा या बड़ा दिखाई देना वैश्विक धारणा को भी प्रभावित कर सकता है।

    प्रस्ताव के समर्थक इसे दुनिया की भौगोलिक तस्वीर को ज्यादा सटीक बनाने और पुराने मानचित्रों से पैदा हुई गलत धारणाओं को दूर करने की दिशा में अहम कदम मान रहे हैं। हालांकि मर्केटर प्रोजेक्शन का नौवहन जैसे कुछ क्षेत्रों में व्यावहारिक महत्व बना रहेगा। ऐसे में आने वाले समय में दुनिया में अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से कई तरह के नक्शों का इस्तेमाल जारी रह सकता है।

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