मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा (Upper House) में उस समय तीखी स्थिति पैदा हो गई जब माकपा (CPI-M) के वरिष्ठ सांसद जॉन ब्रिटास (John Brittas) ने अपने खिलाफ इस्तेमाल की गई अमर्यादित टिप्पणी को लेकर विशेषाधिकार हनन का मुद्दा उठाया। आरोप है कि उच्च सदन में चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सांसद सुष्मिता देव ने उन्हें ‘लुंगी वाला’ कहकर संबोधित किया।
इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्यसभा के सभापति ने गहरा असंतोष व्यक्त किया और सभी सांसदों को संसदीय मर्यादा बनाए रखने की सख्त हिदायत दी।
क्या है पूरा मामला?
घटना ‘द टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ पर जारी बहस के दौरान हुई।
- ब्रिटास का आरोप: जॉन ब्रिटास द्वारा सभापति को दी गई शिकायत और विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (Privilege Motion) के अनुसार, जब वह अपना पक्ष रख रहे थे, तब भाजपा सांसद सुष्मिता देव अपनी निर्धारित सीट छोड़कर उनके पीछे वाली सीट पर आ गईं। आरोप है कि उन्होंने बार-बार कार्यवाही में बाधा डाली और जॉन ब्रिटास के लिए ‘लुंगी वाला’ शब्द का इस्तेमाल किया।
- दक्षिण भारतीयों के खिलाफ रूढ़िवादी टिप्पणी: ब्रिटास ने अपनी शिकायत में तर्क दिया कि यह कोई अनजाने में दिया गया बयान नहीं था, बल्कि जानबूझकर की गई एक व्यक्तिगत टिप्पणी थी जो दक्षिण भारतीय समुदाय के खिलाफ रूढ़िवादी और अपमानजनक भावना को दर्शाती है।
सभापति की नाराजगी और सांसदों को हिदायत
सदन में इस तरह के असंसदीय व्यवहार और निजी छीटाकंशी पर सभापति ने बेहद कड़ा रुख अपनाया:
| बिंदु | सभापति/पीठ की प्रतिक्रिया |
| मर्यादा का उल्लंघन | उच्च सदन में इस तरह की जातिगत, क्षेत्रीय या पहनावे से जुड़ी टिप्पणियों को संसदीय गरिमा के खिलाफ बताया गया। |
| सख्त हिदायत | सभापति ने सभी सदस्यों को चेतावनी दी कि किसी भी सांसद के पहनावे, क्षेत्र या पहचान को लेकर मजाक उड़ाना या तंज कसना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। |
| कार्रवाई का आश्वासन | सभापति ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि सदन का माहौल खराब करने वाली टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने और नियमानुसार समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं। |
दक्षिण भारतीय पहचान पर ऐतिहासिक तंज का हवाला
सांसद जॉन ब्रिटास ने अपने विशेषाधिकार प्रस्ताव में कहा कि ‘लुंगी वाला’ जैसे शब्दों का ऐतिहासिक रूप से दक्षिण भारतीयों को नीचा दिखाने और उनका उपहास उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। उन्होंने 1960 और 1970 के दशकों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल मुंबई जैसे शहरों में दक्षिण भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाने के लिए किया गया था। इसलिए, देश की सर्वोच्च विधायिका (संसद) में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल बेहद निंदनीय और असंसदीय है


