पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के खिलाफ लामबंदी तेज कर दी है। हाल ही में मक्का में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित त्रिपक्षी रक्षा समझौते—’मक्का संधि’ (Mecca Pact)—ने नई दिल्ली के कूटनीतिक और रणनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। सितंबर 2025 में सऊदी अरब के साथ द्विपक्षीय रक्षा समझौते के बाद, पाकिस्तान ने अब तुर्किये को शामिल कर त्रिपक्षीय सुरक्षा चक्र तैयार किया है। इस समझौते में नैटो (NATO) की तर्ज पर सामूहिक रक्षा का प्रावधान शामिल किया गया है।
| भागीदार देश | गठबंधन में प्रमुख योगदान |
| सऊदी अरब | विशाल आर्थिक संसाधन एवं खाड़ी की रणनीतिक स्थिति |
| तुर्किये | आधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन और नैटो-स्तरीय रक्षा अनुभव |
| पाकिस्तान | विशाल सैन्य बल, परिचालन क्षमता और परमाणु शक्ति |
इस संधि का मुख्य नियम यह है कि किसी भी एक सदस्य देश पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
भारत के लिए क्यों बढ़ रही है रणनीतिक चिंता?
पाकिस्तान इस नए गठजोड़ के जरिए सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत की सख्त सैन्य प्रतिक्रियाओं को रोकने की फिराक में है।
- सैन्य कार्रवाई रोकने का प्रयास: पाकिस्तान की मंशा यह है कि भविष्य में किसी बड़े आतंकवादी हमले के जवाब में यदि भारत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सैन्य कार्रवाई करता है, तो सऊदी अरब और तुर्किये इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर कूटनीतिक या सैन्य हस्तक्षेप करें।
- तुर्की सैन्य तकनीक की आपूर्ति: तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान को ड्रोन और उन्नत मिसाइल तकनीक मुहैया करा रहा है। इस संधि के बाद पाकिस्तानी सेना को तुर्की तकनीक और सऊदी फंडिंग का दोहरा लाभ मिलेगा।
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव: जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों पर पाकिस्तान को ओआईसी (OIC) तथा अन्य वैश्विक मंचों पर तुर्किये और सऊदी अरब का संस्थागत समर्थन मिल सकता है।
क्या वाकई प्रभावी होगा यह त्रिगुट?
कागजी समझौतों के बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि सऊदी अरब और तुर्किये के अपने राष्ट्रीय हित हैं। सऊदी अरब का भारत के साथ वार्षिक व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक का है और वह भारत में बड़े निवेश कर रहा है। रियाद कभी नहीं चाहेगा कि भारत के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक संबंध पाकिस्तान के कारण प्रभावित हों।
हाल के दिनों में अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान और तालिबान के बीच हुई झड़पों के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान के पक्ष में कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं की, जिससे साफ है कि यह समझौता मुख्य रूप से एक रणनीतिक बचाव (Strategic Hedging) का हिस्सा है।
फिर भी, अमेरिका द्वारा इस संधि को मौन समर्थन दिए जाने और चीन-पाकिस्तान की पहले से मौजूद घनिष्ठता को देखते हुए भारत को पश्चिम एशिया में अपनी बहु-पक्षीय कूटनीति (Multi-alignment) को और मजबूत करने की आवश्यकता है।


