जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र शासित प्रदेश को पुनः राज्य का दर्जा (Statehood) देने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीखी नाराजगी व्यक्त की है। एक मीडिया साक्षात्कार में उमर अब्दुल्ला ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर हो रहे विलंब के कारण उनकी राजनीतिक साख को भारी नुकसान पहुंचा है और जनता के आक्रोश का सामना उनकी निर्वाचित सरकार को करना पड़ रहा है।
उमर अब्दुल्ला के प्रमुख बयान और तर्क
- ‘मोदी के वादे’ का हवाला: अब्दुल्ला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से जम्मू-कश्मीर के दौरों के दौरान राज्य का दर्जा बहाल करने की प्रतिबद्धता जताई थी। यह कोई सामान्य राजनीतिक आश्वासन नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ‘मोदी का वादा’ था, जिसकी विश्वसनीयता अब दांव पर है।
- राजनीतिक नुकसान का दर्द: मुख्यमंत्री ने कहा, “मैंने इसके लिए अपनी बड़ी राजनीतिक साख दांव पर लगाई और मुझे पता है कि मैंने इसका एक बड़ा हिस्सा खो दिया है। मैं उन गलतियों की कीमत चुका रहा हूं जो मेरी नहीं हैं।”
- ‘खिसकती फिनिश लाइन’ की तरह: केंद्र की ‘सही समय’ वाली अस्पष्ट नीति की आलोचना करते हुए उन्होंने इसे मैराथन दौड़ जैसा बताया—जहाँ 42 किमी पूरा करने के बाद फिनिश लाइन को और आगे खिसका दिया जाता है।
- आतंकवाद से जोड़ने के तर्क का खंडन: केंद्र के इस तर्क को खारिज करते हुए कि आतंकवाद खत्म होने के बाद राज्य का दर्जा मिलेगा, उन्होंने कहा कि सुरक्षा तंत्र उनके नहीं बल्कि केंद्र के अधीन है। इस तर्क का मतलब यह हुआ कि फैसला दिल्ली के बजाय इस्लामाबाद तय करेगा।
विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश की प्रशासनिक विसंगतियां
उमर अब्दुल्ला ने वर्तमान प्रशासनिक ढांचे की कमियों को उजागर करते हुए कहा कि एक निर्वाचित सरकार होने के बावजूद उनके पास अधिकार बेहद सीमित हैं:
- प्रमुख संस्थान उपराज्यपाल (LG) के अधीन: जम्मू-कश्मीर ऊर्जा विकास निगम और शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) जैसे बड़े संस्थान अभी भी LG के नियंत्रण में हैं।
- सीमित अधिकार: मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के पास अपने प्रशासनिक सचिवों के चयन या महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति का भी अधिकार नहीं है।
- अनुच्छेद 370 पर रुख: उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 की बहाली से पहले राज्य का दर्जा बहाल होना कानूनी और संवैधानिक रूप से आवश्यक है, क्योंकि अनुच्छेद 370 मूल रूप से संघ और ‘राज्य’ के बीच शक्तियों का बंटवारा था।
अब्दुल्ला ने कहा कि उनकी सरकार राजनीतिक बातचीत से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से राज्य के दर्जे की मांग को आगे बढ़ाना जारी रखेगी।


