संसद से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण कानून) पारित होने के तीन साल पूरे होने के बाद भी इसे लागू न किए जाने पर देश में एक बार फिर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को आड़े हाथों लेते हुए सीधा सवाल दागा है कि सर्वसम्मति से पारित कानून को तीन साल बाद भी लागू क्यों नहीं किया गया?
राहुल गांधी के तीन प्रमुख सवाल
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट साझा कर सरकार की मंशा और इसे लागू करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
- तीन साल बाद भी क्यों अधूरा कानून? राहुल गांधी ने कहा कि साल 2023 में ही कांग्रेस के पूर्ण समर्थन के साथ महिला आरक्षण विधेयक संसद से सर्वसम्मति से पारित हो चुका था। इसके बावजूद इसे धरातल पर उतारने में 3 साल का समय क्यों बीत गया?
- परिसीमन का बेवजह का रोड़ा: उन्होंने सवाल उठाया कि कानून पारित होने के बाद भी इसे जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया से बेवजह क्यों जोड़ा जा रहा है? सरकार को इसे परिसीमन के जाल से निकालकर तुरंत वर्तमान 543 लोकसभा सीटों के आधार पर लागू करना चाहिए।
- 2024 के वादे पर तंज: उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में वादा किया गया था कि चुनाव के तुरंत बाद जनगणना और परिसीमन कराकर इसे लागू कर दिया जाएगा, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
कांग्रेस और विपक्ष की मांगें
- तत्काल प्रभाव से लागू हो आरक्षण: विपक्ष का कहना है कि संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। इसे आगामी चुनावों से ही मौजूदा सीटों के अनुसार लागू किया जा सकता है।
- जातिगत जनगणना की शर्त: राहुल गांधी ने यह भी दोहराया कि आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) महिलाओं के लिए भी कोटा सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जो कि जातिगत जनगणना के आधार पर ही संभव है।
क्या है पूरा विवाद?
केंद्र सरकार ने सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान 128वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराया था, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की जानी हैं। हालांकि, विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, यह कानून नई जनगणना के प्रकाशन और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा।
अब तीन साल बीत जाने के बावजूद जनगणना और परिसीमन का काम पूरा न होने के कारण विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिलाओं के साथ ‘सिंबॉलिज्म’ (दिखावे की राजनीति) कर रही है और कानून को अनिश्चित काल के लिए टालना चाहती है।


