हाल ही में समाप्त हुए छात्र आंदोलन के बाद, अब देश में E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल मिश्रित ईंधन) को लेकर जन-असंतोष एक बार फिर तेजी से भड़कने लगा है। पेट्रोल में एथेनॉल के अनिवार्य मिश्रण और 2023 से पहले बने वाहनों में आ रही तकनीकी दिक्कतों को लेकर आम जनता से लेकर टैक्सी यूनियनें तक सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रही हैं। इस क्रम में टैक्सी यूनियनों ने E20 पेट्रोल नीति के विरोध में 4 अगस्त 2026 को संसद तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने का ऐलान कर दिया है, जिससे केंद्र की मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
1. ग्लोबल ऑयल क्राइसिस से शुरू हुआ विवाद
इस विवाद की शुरुआत इस साल की शुरुआत में वैश्विक स्तर पर उत्पन्न हुए तेल संकट से हुई थी:
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट: फरवरी-मार्च 2026 में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित हुआ, जिससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े।
- E25 और E30 का प्रस्ताव: तेल संकट से निपटने के लिए सरकार ने ईंधन में एथेनॉल का दायरा E20 से बढ़ाकर E25 और E30 करने की संभावनाएं तलाशनी शुरू कीं।
- उपभोक्ताओं का विरोध: सरकार के इस कदम का वाहन चालकों ने कड़ा विरोध किया। लोगों का कहना है कि E20 के इस्तेमाल से गाड़ियों का माइलेज घट गया है और 2023 से पहले के गैर-E20 मॉडल के फ्यूल पंप व इंजन पार्ट्स खराब हो रहे हैं।
2. वाहन चालकों और जनता की मुख्य मांगें
सोशल मीडिया अभियानों और विभिन्न यूनियनों की ओर से सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
| मांग का क्षेत्र | जनता और यूनियनों की मुख्य मांग |
| ईंधन का विकल्प (Fuel Choice) | पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ-साथ पुरानी गाड़ियों के लिए E10 या E0 (शुद्ध पेट्रोल) उपलब्ध कराया जाए। |
| मूल्य में कटौती (Price Reduction) | चूंकि एथेनॉल सस्ता है और E20 से माइलेज कम मिलता है, इसलिए E20 पेट्रोल के दाम घटाए जाएं। |
| पारदर्शिता (Transparency) | ऑटोमोबाइल कंपनियां स्पष्ट करें कि कौन से पुराने वाहन E20 के अनुकूल हैं और कौन से नहीं। |
विरोध का रुख: “छात्र आंदोलन के शांत पड़ते ही E20 फ्यूल का मुद्दा अब आम नागरिकों के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए भी सरकार को घेरने का मुख्य जरिया बनता जा रहा है।”
केंद्रीय मंत्रियों पर बढ़ता दबाव
इस पूरे विवाद में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी सीधे निशाने पर हैं। यद्यपि सरकार का तर्क है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल का आयात घटता है और किसानों को फायदा होता है, लेकिन उपभोक्ताओं का कहना है कि बिना विकल्प दिए उन पर जबरन प्रयोग नहीं थोपा जाना चाहिए।
4 अगस्त को प्रस्तावित संसद मार्च से पहले यदि सरकार ने ईंधन विकल्पों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई, तो यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।


