पश्चिम बंगाल की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रही है। हालिया विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद अब पार्टी के अस्तित्व पर ही यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के भीतर उठ रहे सुरों के अनुसार, ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के भावी युवराज अभिषेक बनर्जी को इस ऐतिहासिक दुर्गति का मुख्य खलनायक माना जा रहा है।
सांगठनिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न करना
ममता बनर्जी ने जिस तृणमूल कांग्रेस को जमीन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के दम पर खड़ा किया था, अभिषेक बनर्जी ने पार्टी की कमान हाथ में लेते ही उस पुराने ढांचे को पूरी तरह बदल दिया।
- कॉर्पोरेट संस्कृति का प्रवेश: अभिषेक बनर्जी ने राजनीति में ‘कॉर्पोरेट स्टाइल’ और प्रोफेशनल सलाहकारों (जैसे I-PAC) की दखलअंदाजी को जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया।
- पुराने नेताओं की उपेक्षा: जमीन से जुड़े और ममता के वफादार वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया गया, जिससे पार्टी का जमीनी कार्यकर्ताओं से संपर्क टूट गया।
अति-आत्मविश्वास और गलत चुनावी रणनीति
हालिया चुनावों में पार्टी की हार के पीछे अभिषेक बनर्जी की अनुभवहीनता और जिद्दी रणनीतियों को जिम्मेदार ठहराया गया है:
- टिकट वितरण में मनमानी: अभिषेक ने ‘युवा चेहरों’ को आगे लाने के नाम पर स्थानीय समीकरणों और अनुभवी जिताऊ उम्मीदवारों की अनदेखी कर अपने करीबियों को टिकट बांटे।
- अहंकार और अति-आत्मविश्वास: पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जमीन पर उठ रही सत्ता-विरोधी लहर (Anti-incumbency) और जनता के गुस्से को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहा, जिससे चुनावी मैदान में टीएमसी औंधे मुंह गिर गई।
भ्रष्टाचार के दाग और आंतरिक कलह
अभिषेक बनर्जी के कार्यकाल के दौरान पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के मामलों और सांगठनिक फूट ने टीएमसी की बची-खुची साख को भी खत्म कर दिया।
अस्तित्व का संकट: भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला घोटाला) के सीधे तार शीर्ष नेतृत्व से जुड़ने के कारण जनता का भरोसा पूरी तरह उठ गया। इसके साथ ही ‘पुराने बनाम नए’ (ममता गुट बनाम अभिषेक गुट) की आंतरिक लड़ाई ने पार्टी को भीतर से खोखला कर दिया।
ममता बनर्जी की विरासत पर संकट
अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी (Heir Apparent) माना जाता था, लेकिन उनके फैसलों ने ममता बनर्जी की सालों की राजनीतिक तपस्या और ‘मां, माटी, मानुष’ की विरासत को दांव पर लगा दिया है। चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि केवल ममता बनर्जी के नाम के सहारे अब पार्टी को नहीं चलाया जा सकता, खासकर तब जब सांगठनिक कमान गलत हाथों में हो। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी इस मलबे से उबरने के लिए क्या नए कदम उठाती है।


