भारतीय खेल जगत से एक बेहद स्तब्ध और दुखी कर देने वाली खबर सामने आई है। देश के महान निशानेबाज और दिग्गज कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। म्यूनिख (जर्मनी) में आयोजित आईएसएसएफ (ISSF) विश्व कप से भारतीय दल के साथ लौटते समय विमान में उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी हार्ट सर्जरी (स्टेंट लगाने की प्रक्रिया) भी की गई थी, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अभिनव बिंद्रा सहित पूरे खेल जगत ने उनके असामयिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
यह दुखद समाचार ऐसे समय पर आया है जब देश उनकी कूटनीतिक और असाधारण कोचिंग क्षमता के कारण हालिया सफलताओं का जश्न मना रहा था। आइए जानते हैं खुद कभी ओलंपिक पदक न जीत पाने वाले इस महान खिलाड़ी के संघर्ष और मनु भाकर को बुलंदियों पर पहुंचाने की पूरी कहानी।
खुद का अधूरा सपना: ओलंपिक पदक का संघर्ष
उत्तराखंड में जन्मे जसपाल राणा ने 1990 के दशक में भारतीय निशानेबाजी (Shooting) को एक नई पहचान दी थी। उन्होंने एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में पदकों की झड़ी लगा दी थी। 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में महज 18 साल की उम्र में उन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर सनसनी फैला दी थी। राष्ट्रमंडल खेलों (CWG) में तो उनके नाम 15 पदक (9 स्वर्ण सहित) जीतने का एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज है। 2006 के दोहा एशियाई खेलों में उन्होंने 3 स्वर्ण पदक जीतकर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की थी।
इतने शानदार करियर और देश के लिए सौ से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी जसपाल राणा का एक सपना अधूरा रह गया था — ओलंपिक पदक। उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक सहित अन्य खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन वह बतौर खिलाड़ी ओलंपिक पोडियम तक नहीं पहुंच सके।
मनु भाकर के पीछे गुरु का जुनून
जो सपना जसपाल राणा एक खिलाड़ी के रूप में पूरा नहीं कर पाए, उसे उन्होंने अपने शिष्यों के जरिए पूरा करने का जुनून पाल लिया। साल 2012 में उन्होंने राष्ट्रीय जूनियर पिस्टल टीम के मुख्य कोच की कमान संभाली। उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे कई विश्वस्तरीय शूटर देश को दिए। लेकिन उनके कोचिंग करियर की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक गाथा शूटर मनु भाकर के साथ जुड़ी:
- विवाद और अलगाव: टोक्यो ओलंपिक (2020) के दौरान मनु भाकर और जसपाल राणा के बीच मतभेद इतने बढ़ गए थे कि दोनों के रास्ते अलग हो गए। टोक्यो में मनु का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा और वह टूट चुकी थीं।
- गुरु-शिष्य की ऐतिहासिक वापसी: साल 2023 में मनु भाकर ने एक बार फिर अपने पुराने गुरु जसपाल राणा पर भरोसा जताया। राणा ने मनु को न केवल तकनीकी रूप से सुधारा बल्कि उन्हें मानसिक रूप से बेहद मजबूत बनाया। वह अभ्यास के दौरान बिल्कुल ओलंपिक जैसा दबाव और माहौल तैयार करते थे।
- पेरिस ओलंपिक में रचा इतिहास: इसी कठिन तपस्या का नतीजा था कि मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक 2024 में दो कांस्य (Bronze) पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मनु की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे जसपाल राणा के उसी जुनून की गूंज थी, जिसने उनके अपने अधूरे ओलंपिक सपने को साकार कर दिया था।
पुरस्कार और अद्वितीय विरासत
जसपाल राणा को खेल के प्रति उनके इसी बेमिसाल समर्पण के लिए देश के सर्वोच्च खेल सम्मानों से नवाजा गया था:
- अर्जुन पुरस्कार: 1994 (सिर्फ 18 वर्ष की आयु में)
- पद्म श्री: 1997
- द्रोणाचार्य पुरस्कार: 2020 (कोचिंग के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान)
हाल ही में फरवरी 2025 में नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) ने उन्हें 25 मीटर पिस्टल इवेंट का हाई-परफॉर्मेंस कोच नियुक्त किया था। वह अपनी आखिरी सांस तक भारतीय निशानेबाजों को तराशने के काम में जुटे रहे। जसपाल राणा का असमय जाना भारतीय खेल जगत के लिए एक ऐसा शून्य है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।


