फिल्म: गवर्नर: द साइलेंट सेविअर (Governor: The Silent Saviour)
निर्देशक: चिन्मय डी. मांडलेकर
मुख्य कलाकार: मनोज बाजपेयी, अदा शर्मा, मधू, नौशाद मोहम्मद कुंजू
समय: 2 घंटे 2 मिनट
रेटिंग: 3/5
बॉलीवुड में अक्सर देश की सुरक्षा और खुफिया मिशनों पर फिल्में बनती हैं, लेकिन देश को दिवालिया होने से बचाने वाले ‘आर्थिक युद्ध’ पर सिनेमा कम ही देखने को मिलता है। निर्देशक चिन्मय मांडलेकर की फिल्म ‘गवर्नर’ भारत के इसी अदृश्य कूटनीतिक और वित्तीय संघर्ष की एक गंभीर दास्तान है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी 1990 के दशक की शुरुआत में देश के गंभीर आर्थिक संकट (Balance of Payments Crisis) पर आधारित है, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश दिवालिया होने की कगार पर था। यह कहानी वास्तविक जीवन के पूर्व आरबीआई गवर्नर एस. वेंकिटरमणन के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिन्हें फिल्म में ‘ए. रामनन’ (मनोज बाजपेयी) का नाम दिया गया है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच रामनन को देश की साख बचाने के लिए एक बेहद विवादास्पद और गुप्त मिशन को अंजाम देना पड़ता है-देश का सोना गिरवी रखना और उसे एयरलिफ्ट कराना। फिल्म इसी तनावपूर्ण कूटनीति और फैसलों को थ्रिलर के रूप में दिखाती है।
फिल्म में क्या अच्छा है (Positive Points)?
- मनोज बाजपेयी का अभिनय: फिल्म पूरी तरह से मनोज बाजपेयी के कंधों पर टिकी है। उन्होंने आरबीआई गवर्नर के रूप में बेहद शांत, गंभीर और प्रभावशाली अभिनय किया है। बिना किसी शोर-शराबे या लाउड डायलॉग्स के, उन्होंने संकट में घिरे एक सच्चे देशभक्त और लीडर के किरदार को बखूबी जिया है।
- इकोनॉमिक्स को थ्रिलर बनाना: आम तौर पर अर्थशास्त्र और वित्त (Finance) जैसे विषयों को नीरस माना जाता है, लेकिन फिल्म का स्क्रीनप्ले बोर्डरूम के फैसलों और राजनीतिक वार्ताओं को भी किसी सस्पेंस थ्रिलर की तरह पेश करने में कामयाब रहा है।
- सपोर्टिंग कास्ट: अदा शर्मा ने एक खोजी पत्रकार ‘अदिति वर्मा’ के रूप में और मधू ने रामनन की पत्नी ‘वंदिता’ के रूप में कहानी को एक मानवीय और पारिवारिक पहलू दिया है। डिप्टी गवर्नर के रूप में नौशाद मोहम्मद कुंजू का काम भी बेहतरीन है।
कहां कमी रह गई (Negative Points)?
- धीमी रफ्तार (Pacing): फिल्म का कुछ हिस्सा काफी धीमा हो जाता है, विशेष रूप से जहां भारी-भरकम संवादों (Dialogue-heavy scenes) के कारण कहानी की रफ्तार रुक जाती है।
- चरित्रों का अधूरा विकास: मुख्य किरदार के अलावा कुछ महत्वपूर्ण साइड किरदारों को उतना समय नहीं मिल पाया, जिससे दर्शक उनसे पूरी तरह जुड़ नहीं पाते।
- अति-नाटकीयता: इतिहास की वास्तविक घटनाओं को थ्रिलर का रूप देने के लिए कुछ दृश्यों को जरूरत से ज्यादा नाटकीय (Dramatized) बना दिया गया है, जिससे कहीं-कहीं इसकी प्रामाणिकता थोड़ी कम होती महसूस होती है।
अंतिम फैसला: देखें या नहीं?
‘गवर्नर’ कोई पारंपरिक मसाला या एक्शन फिल्म नहीं है। यह उन लोगों के लिए एक बेहतरीन और जरूरी फिल्म है जो भारतीय इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में रुचि रखते हैं।
निष्कर्ष: यदि आप मनोज बाजपेयी के शानदार अभिनय के मुरीद हैं और देश के एक ऐसे अनकहे इतिहास को देखना चाहते हैं जिसने आज के भारत की नींव रखी, तो यह फिल्म निश्चित रूप से सिनेमाघरों में देखने लायक है।


