अमेरिकी अदालत ने ट्रम्प सरकार के $1,00,000 (लगभग 84 लाख रुपये) के H-1B वीजा शुल्क को रद्द कर दिया है। बोस्टन के यूएस डिस्ट्रिक्ट जज लियो सोरोकिन ने इस नीति को “गैर-कानूनी टैक्स” करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति के पास संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के बिना ऐसा टैक्स लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यह फैसला भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (IT) पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है।
फैसले के मुख्य बिंदु और अदालत की टिप्पणी
- अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: जज लियो सोरोकिन ने अपने 42 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रम्प प्रशासन ने इस भारी-भरकम राशि को ‘जुर्माना या नियामक शुल्क’ (Regulatory Fee) बताने की कोशिश की थी। हालांकि, वास्तविकता में यह एक ‘टैक्स’ की तरह लागू किया गया था, जिसे वसूलने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।
- संसद की मंजूरी अनिवार्य: अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति ‘इमिग्रेशन एंड नेशनेलिटी एक्ट’ (INA) का हवाला देकर अपनी मर्जी से कोई नया टैक्स नहीं थोप सकते।
“इस $1,00,000 के भुगतान की प्रकृति और इसे लागू करने का तरीका यह साफ करता है कि यह एक टैक्स है, चाहे इसे कोई भी नाम दिया जाए।” — जज लियो सोरोकिन
क्यों लागू की गई थी यह भारी फीस?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सितंबर 2025 में एक शासकीय घोषणा (Presidential Proclamation) के जरिए नए H-1B वीजा आवेदनों पर $1,00,000 की सालाना फीस लगाने का आदेश दिया था। ट्रम्प प्रशासन का तर्क था कि इस कदम से विदेशी कामगारों द्वारा अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीनने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी और स्थानीय लोगों को रोजगार के अधिक अवसर मिलेंगे।
इस नीति से पहले, अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को एक H-1B वीजा स्पॉन्सर करने के लिए कंपनी के आकार के आधार पर महज $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 से 4.2 लाख रुपये) ही देने पड़ते थे। ट्रम्प के फैसले से यह खर्च 20 से 50 गुना तक बढ़ गया था।
भारतीयों और अमेरिकी उद्योगों पर इसका असर
H-1B वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा है, जो अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा और अनुसंधान जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। हर साल जारी होने वाले 85,000 H-1B वीजा में से लगभग 70-75% का लाभ भारतीय आईटी पेशेवर उठाते हैं।
- आवेदनों में आई भारी गिरावट: कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, इस अप्रत्याशित फीस वृद्धि के कारण अमेरिकी कंपनियों ने विदेशी पेशेवरों को काम पर रखना लगभग बंद कर दिया था। फरवरी 2026 तक अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) को इस भारी शुल्क के केवल 85 भुगतान ही प्राप्त हुए थे।
- 20 राज्यों ने दी थी चुनौती: इस घाती नीति के खिलाफ अमेरिका के 20 राज्यों के डेमोक्रेटिक अटॉर्नी जनरल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि इस फीस की वजह से अस्पतालों में डॉक्टरों और विश्वविद्यालयों में शोधकर्ताओं व शिक्षकों की भारी किल्लत हो गई है।
भारतीय प्रवासी संगठनों (जैसे FIIDS और इंडियास्पोरा) ने इस न्यायिक फैसले का स्वागत किया है और इसे अमेरिकी नवाचार (Innovation) तथा निष्पक्षता की जीत बताया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस फैसले पर असंतोष जताते हुए इसे ऊपरी अदालत में चुनौती देने (अपील करने) की बात कही है।


