भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-2’ ने चंद्रमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी वैज्ञानिक खोज की है। अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिले रडार डेटा का विश्लेषण कर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सतह के नीचे पानी की बर्फ होने के मजबूत संकेत पाए हैं।
इस ऐतिहासिक वैज्ञानिक खोज से जुड़े मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
परमानेंटली शैडोड रीजन (PSR) में खोज
- अंधेरे क्रेटरों का अध्ययन: वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित उन क्रेटरों का अध्ययन किया, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन्हें ‘परमानेंटली शैडोड रीजन’ कहा जाता है।
- शून्य से नीचे तापमान: इन क्षेत्रों में तापमान माइनस 248 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, जिसके कारण यहां अरबों वर्षों से बर्फ पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में जमी रह सकती है।
- फॉस्टिनी क्रेटर मुख्य दावेदार: वैज्ञानिकों ने डेटा के आधार पर चार मुख्य क्रेटरों की पहचान की है। इनमें ‘फॉस्टिनी क्रेटर’ के भीतर स्थित करीब 1.1 किलोमीटर चौड़ा एक छोटा क्रेटर सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरा है, जहां सतह के नीचे बर्फ छिपी होने की सबसे अधिक संभावना है।
अत्याधुनिक रडार तकनीक का कमाल
इस खोज में चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में लगे ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (DFSAR) उपकरण का उपयोग किया गया है।
| तकनीक/पैरामीटर | उपयोग और विशेषता |
| DFSAR रडार | यह चंद्रमा की सतह के नीचे की परतों को भेदकर माइक्रोवेव इमेजिंग करने में पूरी तरह सक्षम है। यह दुनिया का पहला पूर्ण पोलरिमेट्रिक रडार है जो L-बैंड और S-बैंड पर काम करता है। |
| CPR और DOP तकनीक | चट्टानों और बर्फ के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने सर्कुलर पोलराइजेशन रेशियो (CPR) और डिग्री ऑफ पोलराइजेशन (DOP) तकनीक का उपयोग किया। |
भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए ‘गेमचेंजर’
2019 में चंद्रयान-2 का लैंडर भले ही सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर पाया था, लेकिन उसका ऑर्बिटर पिछले 7 वर्षों से लगातार काम कर रहा है और मूल्यवान डेटा भेज रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा पर पानी की यह उपलब्धता भविष्य के मानव मिशनों के लिए क्रांतिकारी साबित होगी।
उपयोगिता: इस खोजी गई बर्फ को भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पीने के पानी, सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और रॉकेट के लिए हाइड्रोजन ईंधन में परिवर्तित किया जा सकेगा। इससे चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव बस्तियां बसाना और भविष्य के अंतरग्रहीय मिशनों को अंजाम देना काफी आसान हो जाएगा।


